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60 साल का पसीना… और रातों-रात गायब हो गई जमीन! शंकरगढ़ में सर्व आदिवासी समाज का हल्लाबोल, आंदोलन की चेतावनी

बलरामपुर। छत्तीसगढ़ के ‘विशेष पिछड़ी जनजाति’ पहाड़ी कोरवाओं की पुश्तैनी जमीन पर भू-माफियाओं के गिद्ध जैसी नजरें गड़ गई हैं। बलरामपुर जिले के शंकरगढ़ विकासखंड अंतर्गत विनायकपुर में आयोजित एक विशाल बैठक में जो खुलासे हुए, उन्होंने प्रशासनिक पारदर्शिता के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज के बैनर तले जुटी सैकड़ों आदिवासियों की भीड़ ने एक स्वर में हुंकार भरी है: “जमीन हमारी है, और हम इसे छीनने नहीं देंगे।”

प्रशासनिक जादूगरी: एक जमीन, 14 दावेदार!

बैठक में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल जिला अध्यक्ष बसंत कुजूर के सामने ग्रामीणों ने जो दस्तावेज और आपबीती रखी, वह चौंकाने वाली है। ग्राम पौड़ी खुर्द रजुवाढोढी के ग्रामीणों का आरोप है कि जिस जमीन को उनके पूर्वजों ने 60-65 साल पहले जंगलों को साफ कर उपजाऊ बनाया, उसे 1971-72 के बंदोबस्त के दौरान अधिकारियों की मिलीभगत से बाहरी लोगों के नाम कर दिया गया।

“हैरानी की बात यह है कि एक ही जमीन के लिए एक साथ 14 लोगों के नाम पर पट्टे जारी कर दिए गए। नियमों को ताक पर रखकर न कोई इश्तिहार निकाला गया और न ही मौके पर जांच की गई।” — पीड़ित ग्रामीण

डर के साये में ‘पहाड़ी कोरवा’

पीड़ितों ने बताया कि अब भू-माफिया न केवल उनकी जमीन पर कब्जा कर रहे हैं, बल्कि उन्हें गांव छोड़ने की धमकियां भी दे रहे हैं। आदिवासियों का कहना है कि उन्होंने तहसील से लेकर महामहिम राष्ट्रपति तक न्याय की गुहार लगाई, लेकिन फाइलों के बोझ तले उनकी आवाज दब गई।

जंगल पर ‘टमाटर’ का प्रहार!

सिर्फ जमीन ही नहीं, क्षेत्र के हरे-भरे जंगलों पर भी माफियाओं की कुल्हाड़ी चल रही है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि:

  • अवैध रूप से पेड़ों की कटाई की जा रही है।
  • जंगलों को साफ कर वहां टमाटर और अन्य फसलें उगाई जा रही हैं।
  • वन विभाग के अधिकारी इस पूरी तबाही को मूकदर्शक बनकर देख रहे हैं।

आर-पार की लड़ाई का ऐलान

जिला अध्यक्ष बसंत कुजूर ने स्पष्ट किया कि आदिवासी समाज अब चुप नहीं बैठेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही इन फर्जी पट्टों को निरस्त नहीं किया गया और आदिवासियों को उनकी पुश्तैनी जमीन वापस नहीं मिली, तो पूरे जिले में उग्र आंदोलन छेड़ा जाएगा।

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