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भारत–अमेरिका ट्रेड डील: अवसर, आशंका और असली परीक्षा

फरवरी 2026 में घोषित भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौता सिर्फ एक आर्थिक दस्तावेज नहीं है। यह कूटनीति, रणनीति और घरेलू राजनीति का संगम बन गया है। एक ओर इसे नरेंद्र मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है, दूसरी ओर विपक्ष, खासकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, इसे एकतरफा झुकाव करार दे रहा है। सच क्या है, यह भावनाओं से नहीं, तथ्यों से तय होगा।

टैरिफ में राहत: कितनी बड़ी जीत?

समझौते के तहत ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत करने और लगभग 40,000 करोड़ रुपये के रिफंड की घोषणा को सरकार बड़ी सफलता बता रही है। यदि यह राहत स्थायी रूप से लागू रहती है तो निर्यातकों के लिए यह निश्चित रूप से राहत की बात है।

लेकिन सवाल यह भी है कि 18 प्रतिशत की दर क्या दीर्घकाल में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दे पाएगी, या यह केवल अस्थायी सांस लेने की जगह है? वैश्विक व्यापार में मामूली प्रतिशत भी बड़े फर्क पैदा करते हैं।

500 अरब डॉलर की खरीद: बोझ या रणनीति?

डील के तहत भारत द्वारा ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और कोकिंग कोल समेत लगभग 500 अरब डॉलर की खरीद का आश्वासन दिया गया है। समर्थक इसे ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी आधुनिकीकरण की दिशा में निवेश मानते हैं। आलोचक इसे आयात-निर्भरता बढ़ाने वाला कदम बता रहे हैं।

सच्चाई शायद बीच में है। यदि ये खरीदें भारत की दीर्घकालीन ऊर्जा जरूरतों और विनिर्माण विस्तार से जुड़ी हैं, तो इन्हें केवल “खर्च” नहीं कहा जा सकता। परंतु यदि घरेलू उत्पादन को पीछे धकेलकर आयात बढ़ता है, तो आत्मनिर्भरता का तर्क कमजोर पड़ेगा।

किसानों की चिंता

विपक्ष और किसान संगठनों का सबसे बड़ा डर अमेरिकी कृषि उत्पादों की संभावित “डंपिंग” को लेकर है। सरकार का कहना है कि गेहूं और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षा दी गई है।

नीतियों का असली परीक्षण जमीन पर होगा। यदि आयातित कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में कीमतें गिराते हैं तो छोटे किसान प्रभावित होंगे। इसलिए निगरानी तंत्र मजबूत होना जरूरी है। व्यापार समझौते का लाभ तभी सार्थक है जब ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुरक्षित रहे।

भू-रणनीतिक परिप्रेक्ष्य

यह समझौता ऐसे समय में आया है जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं पुनर्गठित हो रही हैं और चीन के विकल्प के रूप में भारत को देखा जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की प्राथमिकताओं में भी रणनीतिक साझेदारियों को नई परिभाषा दी जा रही है।

भारत के लिए यह अवसर है कि वह केवल बाजार नहीं, बल्कि विनिर्माण और तकनीक का विश्वसनीय केंद्र बने। यदि यह डील उस दिशा में कदम है, तो इसका महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा।

राजनीतिक आरोप बनाम नीति विमर्श

विपक्ष द्वारा “दबाव में समझौता” जैसे आरोप राजनीति का हिस्सा हो सकते हैं, परंतु राष्ट्रीय हित के प्रश्न पर बहस ठोस तथ्यों पर होनी चाहिए। इसी तरह सरकार को भी आलोचनाओं को खारिज करने के बजाय पारदर्शी डेटा और प्रगति रिपोर्ट के साथ जवाब देना चाहिए।

लोकतंत्र में किसी भी बड़े आर्थिक निर्णय की वैधता जनता के भरोसे से आती है। वह भरोसा पारदर्शिता से बनता है, प्रचार से नहीं।

आगे की राह

यह अंतरिम समझौता है, अंतिम व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौता अभी बाकी है। असली परीक्षा वहीं होगी।

सरकार के सामने तीन स्पष्ट चुनौतियां हैं:

  1. घरेलू उद्योग और किसानों की सुरक्षा सुनिश्चित करना
  2. आयात-निर्यात संतुलन को दीर्घकाल में सकारात्मक बनाना
  3. निवेश और रोजगार के वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक करना

यदि ये लक्ष्य पूरे होते हैं, तो यह डील ऐतिहासिक साबित हो सकती है। यदि नहीं, तो यह केवल एक राजनीतिक उपलब्धि बनकर रह जाएगी।

राष्ट्रीय हित भावनाओं से नहीं, परिणामों से तय होते हैं। अब देश को परिणाम का इंतजार है।

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