सुप्रीम कोर्ट की दोटूक: ‘कानून से नहीं, सोच बदलने से रुकेगी नफरती बयानबाजी’
नई दिल्ली | देश में बढ़ती हेट स्पीच की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को राजनीतिज्ञों और संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों को कड़ी नसीहत दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि नफरत को केवल कानूनों के जरिए नहीं मिटाया जा सकता, इसके लिए समाज और राजनेताओं को अपनी ‘वैचारिक बुनियाद’ में सुधार करना होगा।
“शब्दों की जननी सोच है”: जस्टिस नागरत्ना
सुनवाई के दौरान जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने एक बेहद मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा, “भाषण की उत्पत्ति विचार से होती है। आप विचारों को कैसे नियंत्रित कर सकते हैं? हमें उन विचारों को मिटाना होगा जो संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ हैं।” अदालत ने जोर दिया कि भाईचारा बढ़ाना किसी एक संस्था की नहीं, बल्कि सभी राजनीतिक दलों की सामूहिक जिम्मेदारी है।
कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां:
संवैधानिक मर्यादा: सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्तियों का आचरण संविधान की शपथ के अनुरूप होना चाहिए।

भाईचारे का संदेश: मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा कि लोकतंत्र की खूबसूरती वैचारिक मतभेदों में है, लेकिन यह प्रतिद्वंद्विता व्यक्तिगत दुश्मनी या सामुदायिक नफरत में नहीं बदलनी चाहिए।
राजनीतिक जिम्मेदारी: जस्टिस जायमाल्य बागची ने कहा कि अदालतें पहले भी कई गाइडलाइंस (जैसे ‘अमीश देवगन’ और ‘कौशल किशोर’ केस) दे चुकी हैं, लेकिन असली जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की है कि वे इन्हें लागू करें।
याचिका पर सख्त रुख: ‘चुनिंदा निशाना’ मंजूर नहीं
यह सुनवाई असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा के कथित बयानों और एक विवादास्पद वीडियो के खिलाफ दायर याचिका पर हो रही थी। हालांकि, कोर्ट ने याचिका के स्वरूप पर आपत्ति जताई:
पक्षपात का आरोप: बेंच ने कहा कि याचिका किसी एक व्यक्ति या विशेष पार्टी को केंद्र में रखकर तैयार की गई लगती है।
वस्तुनिष्ठता की मांग: CJI ने याचिकाकर्ताओं से कहा, “आपकी याचिका से यह आभास नहीं होना चाहिए कि आप किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ हैं। न्यायपालिका को राजनीतिक अखाड़ा न बनाएं।” 3. नई याचिका का निर्देश: कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को वर्तमान याचिका वापस लेने और एक ऐसी नई, व्यापक याचिका दायर करने का निर्देश दिया जो सभी दलों के लिए समान रूप से लागू होने वाले दिशा-निर्देशों की मांग करती हो।
आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल को याचिका में संशोधन के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। अदालत अब इस मुद्दे को किसी एक नेता के खिलाफ कार्रवाई के बजाय, पूरे देश के लिए व्यापक संवैधानिक दिशा-निर्देश तय करने के नजरिए से देखेगी।
