अरावली बचाओ आंदोलन के बाद सरकार का कदम वापस, सामाजिक-आर्थिक बहस तेज
अरावली पर्वतमाला को लेकर चल रहे अरावली बचाओ आंदोलन के राजनीतिक प्रभावों के बीच सरकार ने अपना कदम वापस ले लिया है। इसे सरकार की राजनीतिक मजबूरी के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि इस फैसले के बाद सामाजिक स्तर पर इस तरह के आंदोलनों की भूमिका और उनके प्रभाव को लेकर बहस तेज हो गई है।
आंदोलन से जुड़े पक्षों का कहना है कि अरावली पर्वत को बचाया जाना चाहिए। यह मांग उस क्षेत्र के कुछ लोगों की है, लेकिन इसके साथ यह सवाल भी उठ रहा है कि राजस्थान के लोगों को कोयला चाहिए तो वह कोयला छत्तीसगढ़ से ही आएगा। यदि बिजली चाहिए तो राज्य स्वयं पूरी बिजली पैदा नहीं कर सकता। मोबाइल फोन की जरूरत है तो मोबाइल बनाने वाली कंपनियां भी कहीं और स्थित हैं। ऐसे में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का प्रश्न सामने आता है।
इस पूरे विमर्श में यह मुद्दा भी उठाया जा रहा है कि कुछ लोग जंगल बचाओ, नदी बचाओ और पहाड़ बचाओ की वकालत करते हैं, वहीं कुछ लोग रेल और सड़क निर्माण की बात करते हैं। कुछ वर्ग यह भी कहते हैं कि खेती की जमीन को दूसरे कामों में नहीं लगाया जाना चाहिए। सवाल यह है कि जंगलों का विस्तार भी हो, रेल और सड़कें भी बनें, बांध और तालाब भी तैयार हों, मकान भी बनें और खेती की जमीन भी कम न हो, तो यह सब एक साथ कैसे संभव होगा।
विशेष रूप से राजस्थान को लेकर यह तर्क दिया जा रहा है कि लोगों को रेल चाहिए, लेकिन जमीन पर नहीं। आलोचक इसे व्यावहारिक विरोधाभास मानते हैं। उनका कहना है कि यदि कोयला चाहिए तो पत्थर भी देना पड़ेगा, और यदि मकान चाहिए तो गिट्टी पहाड़ों से ही आएगी, वह आसमान से नहीं आएगी।
इन तर्कों के साथ यह मांग भी सामने आ रही है कि सभी पक्ष एक साथ बैठकर यह तय करें कि कितनी जमीन जंगल के लिए होगी, कितनी तालाबों के लिए, कितनी खेती के लिए और कितनी सड़क व रेल के लिए। अरावली बचाओ आंदोलन के बाद यह बहस अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रही, बल्कि विकास, संसाधन और सामाजिक प्राथमिकताओं के व्यापक प्रश्न से जुड़ गई है।

