न्यायपालिका की सीमा, जनहित की परिभाषा और न्यायिक संयम की अनिवार्यता
समकालीन विमर्श पर आधारित प्रकाशन योग्य लेख
हाल में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह कहना कि न्याय के लिए मध्यस्थता को अधिक प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और न्यायालयों का हस्तक्षेप विशेष परिस्थितियों तक सीमित रहना चाहिए, एक स्वागतयोग्य संकेत है। यह वही विचार है जिसका पक्ष मैं लंबे समय से लेता आया हूं। यह केवल न्यायिक सुधार का प्रश्न नहीं है, बल्कि संवैधानिक मर्यादा और शक्ति-संतुलन का मूल प्रश्न है।
न्यायपालिका की भूमिका: अधिकारों तक सीमित क्यों हो
संविधान की मूल संरचना में न्यायपालिका की भूमिका स्पष्ट है।
न्यायपालिका का दायित्व व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है।
जनहित की चिंता करना, नीतियां बनाना और सामाजिक-आर्थिक दिशा तय करना विधायिका और कार्यपालिका का काम है।
जब न्यायपालिका “जनहित” के नाम पर नीति और प्रशासनिक निर्णयों में प्रवेश करती है, तो वह अनजाने में अपने दायरे से बाहर निकल जाती है। यह न केवल संस्थागत संतुलन को बिगाड़ता है, बल्कि न्यायपालिका को ऐसे प्रश्नों में उलझा देता है जिनके लिए वह न तो जवाबदेह है और न ही उत्तरदायी।
अरावली प्रकरण: जल्दबाज़ी का ताज़ा उदाहरण
अभी कुछ ही दिन पहले अरावली से जुड़े एक मामले में न्यायालय ने जल्दबाज़ी में फैसला दिया और एक सप्ताह के भीतर ही उसे संशोधित करना पड़ा। यह घटना केवल एक आदेश की वापसी नहीं थी, बल्कि यह प्रश्न खड़ा करती है कि
क्या न्यायपालिका हर पर्यावरणीय, सामाजिक या प्रशासनिक मुद्दे पर अंतिम निर्णायक बनने का प्रयास कर रही है
और यदि जनता की तीखी प्रतिक्रिया न होती, तो क्या वही फैसला स्थायी रूप से लागू नहीं रह जाता
यह उदाहरण बताता है कि न्यायिक अति-हस्तक्षेप कई बार स्वयं न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर देता है।
जनहित बनाम जनदबाव
जनहित और जनदबाव में अंतर है।
जनहित नीति से तय होता है
जनदबाव भावनाओं से
न्यायपालिका यदि जनहित की आड़ में जनदबाव से संचालित होने लगे, तो वह संवैधानिक संस्था नहीं, बल्कि प्रतिक्रियात्मक मंच बनकर रह जाएगी। यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए स्वस्थ नहीं है।
सुप्रसिद्ध मौलिक विचारक बजरंग मुनि जी ने अपने कल के लेख में स्पष्ट लिखा कि
> “जब कोई संस्था अपने मूल कर्तव्य को छोड़कर दूसरों के क्षेत्र में हस्तक्षेप करने लगती है, तब वह सुधारक नहीं, अव्यवस्था का कारण बनती है।”
उनका यह कथन न्यायपालिका पर भी उतना ही लागू होता है। न्यायपालिका का सम्मान उसके संयम से बनता है, उसके विस्तार से नहीं। अधिकारों की रक्षा उसका धर्म है, शासन करना नहीं।
न्यायपालिका और सार्वजनिक संसाधन
एक गंभीर प्रश्न यह भी है कि
क्या हमें असीमित विस्तार वाली न्यायपालिका चाहिए
या एक कुशल, सीमित और केंद्रित न्यायपालिका
न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना ही समाधान नहीं है, यदि
न्यायालय हर विषय में हस्तक्षेप करेगा
और स्वयं को अंतिम समाधानकर्ता मान लेगा
न्यायपालिका का काम “न्याय खेलना” नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना है। समाज का काम उत्पादन करना, व्यवस्था चलाना और जीवन आगे बढ़ाना है। इन भूमिकाओं का भ्रम ही आज की मूल समस्या है।
अंकुश की बात क्यों जरूरी है
“अंकुश” शब्द को अक्सर गलत अर्थों में लिया जाता है।
यह नियंत्रण नहीं, बल्कि संवैधानिक संतुलन है।
विधायिका और कार्यपालिका जैसे न्यायपालिका के फैसलों से बंधी हैं
वैसे ही न्यायपालिका भी संवैधानिक सीमाओं से बंधी होनी चाहिए
यह लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी मजबूती है।
निष्कर्ष
मध्यस्थता को बढ़ावा देने और न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित करने की सुप्रीम कोर्ट की हालिया सोच सही दिशा में कदम है। लेकिन यह सोच तभी सार्थक होगी जब
न्यायपालिका स्वयं को अधिकारों के संरक्षक तक सीमित रखे
जनहित के नाम पर शासन न करे
और संयम को अपनी सबसे बड़ी शक्ति माने
न्यायपालिका का सम्मान उसके विस्तार में नहीं, उसके संयम में है।
यही संविधान की आत्मा है और यही लोकतंत्र की रक्षा का रास्ता।
