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ईरान का संकट: जब अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र और आस्था एक साथ टकराते हैं

ईरान आज केवल एक आर्थिक संकट से नहीं गुजर रहा, बल्कि वह अपने राजनीतिक ढांचे, वैचारिक पहचान और सामाजिक अनुबंध के सबसे कठिन इम्तिहान के दौर में खड़ा है। 2026 की शुरुआत में ईरानी रियाल का डॉलर के मुकाबले 1,35,000 टोमन से नीचे गिरना सिर्फ मुद्रा अवमूल्यन की खबर नहीं है, यह उस व्यवस्था की विफलता का संकेत है जो चार दशक से “इस्लामी क्रांति” के नाम पर जनता से लगातार त्याग की मांग करती रही है। दिसंबर 2025 में 42.2 प्रतिशत तक पहुंची मुद्रास्फीति ने आम ईरानी के जीवन को असहनीय बना दिया है। भोजन, ईंधन, दवाइयां और आवास—सब कुछ आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है।

इस आर्थिक संकट की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह उस देश में घटित हो रहा है जो तेल और गैस जैसे रणनीतिक संसाधनों से भरपूर है। फिर भी प्रतिबंधों, गलत नीतियों और वैचारिक जड़ता ने ईरान को आर्थिक आत्मघात की दिशा में धकेल दिया है।

आर्थिक मंदी का भूत और टूटता सामाजिक धैर्य

विश्व बैंक का अनुमान कि 2026 में ईरान की अर्थव्यवस्था 2.8 प्रतिशत तक संकुचित होगी, इस बात को रेखांकित करता है कि समस्या अस्थायी नहीं, संरचनात्मक है। क्षेत्र के अन्य देश जहां धीरे-धीरे स्थिरता और विकास की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं ईरान पीछे छूटता जा रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों ने स्थिति को कठिन बनाया है, लेकिन यह मान लेना कि सारी जिम्मेदारी बाहरी शक्तियों की है, ईरानी सत्ताधीशों की अपनी असफलताओं पर पर्दा डालना होगा।

सब्सिडी में कटौती, ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी और रोजगार के अवसरों की कमी ने जनता के धैर्य की सीमा तोड़ दी है। तेहरान से लेकर छोटे शहरों और कस्बों तक फैले विरोध प्रदर्शन इस बात का प्रमाण हैं कि यह केवल शहरी मध्यम वर्ग का असंतोष नहीं, बल्कि व्यापक जनाक्रोश है। “न गाजा, न लेबनान, मेरा जीवन ईरान” जैसे नारे यह साफ कर देते हैं कि जनता अब वैचारिक विदेश नीति की कीमत अपने जीवन स्तर से चुकाने को तैयार नहीं है।

सुधारवादी सरकार, लेकिन कट्टरपंथी शिकंजा

राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन की सरकार को सत्ता में आने के समय एक सुधारवादी विकल्प के रूप में देखा गया था। न्यूक्लियर डील के पुनरुद्धार, पश्चिम के साथ रिश्तों में संतुलन, एकल विनिमय दर और सब्सिडी सुधार जैसे प्रस्तावों में यह उम्मीद झलकती थी कि ईरान धीरे-धीरे व्यावहारिक राजनीति की ओर लौट सकता है। लेकिन व्यवहार में यह सरकार एक ऐसे तंत्र में फंसी हुई है, जहां वास्तविक शक्ति निर्वाचित संस्थाओं के बजाय वैचारिक संरक्षकों के हाथों में है।

मार्च 2025 में अर्थव्यवस्था मंत्री हेम्मती का महाभियोग केवल एक मंत्री को हटाने की कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह संकेत था कि संसद में बैठे कट्टरपंथी गुट सुधारों को आगे बढ़ने नहीं देंगे। कृषि, उद्योग और अन्य मंत्रालयों पर लगातार दबाव डालकर पूरे कैबिनेट को अस्थिर बनाए रखना एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है। हर सुधार को “क्रांतिकारी सिद्धांतों से विश्वासघात” करार देकर रोक देना, ईरान को स्थायी जड़ता में धकेल रहा है।

सर्वोच्च नेता और मजहबी संरचना की दीवार

ईरान की सबसे बड़ी समस्या उसका वह राजनीतिक-धार्मिक ढांचा है, जिसमें अंतिम निर्णय का अधिकार जनता या संसद के पास नहीं, बल्कि सर्वोच्च नेता के पास है। वेलायत-ए-फकीह का सिद्धांत व्यवहार में लोकतांत्रिक जवाबदेही को निष्प्रभावी बना देता है। राष्ट्रपति चाहे जितने भी सुधारवादी क्यों न हों, सुरक्षा तंत्र, न्याय व्यवस्था और आंतरिक मंत्रालय जैसे निर्णायक क्षेत्र उनके नियंत्रण से बाहर रहते हैं।

उत्तराधिकार को लेकर चल रही अटकलें – चाहे वह मोक्ताबा खामेनेई हों या खुमैनी परिवार से कोई और- अनिश्चितता को और गहरा करती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में जनता पूरी तरह हाशिये पर है। शरिया-आधारित कठोर नीतियां न केवल सामाजिक जीवन को नियंत्रित करती हैं, बल्कि राजनीतिक सुधारों को भी लगभग असंभव बना देती हैं।

शरिया-आधारित दमन और सामाजिक विद्रोह

महसा अमीनी की मौत के बाद शुरू हुआ विरोध अब केवल हिजाब या नैतिक पुलिस तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक सांस्कृतिक और वैचारिक विद्रोह का रूप ले चुका है। महिलाएं सार्वजनिक रूप से हिजाब उतारकर सिर्फ एक ड्रेस कोड को चुनौती नहीं दे रहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर सवाल उठा रही हैं जो उनके जीवन पर नियंत्रण रखना चाहती है।

सर्वेक्षणों में सामने आ रहा तथ्य कि बड़ी संख्या में ईरानी नागरिक धर्म और राज्य के टूटकर अलग होने के पक्ष में हैं, यह बताता है कि समाज और सत्ता के बीच वैचारिक खाई गहरी हो चुकी है। यह आंदोलन किसी बाहरी शक्ति द्वारा संचालित नहीं, बल्कि भीतर से उपजा हुआ असंतोष है।

लोकतंत्र का दम घुटता हुआ स्वर

ईरान को “नॉट फ्री” श्रेणी में रखा जाना कोई औपचारिक लेबल नहीं, बल्कि एक यथार्थ का बयान है। उम्मीदवारों पर वीटो, चुनावी सीमाएं, मीडिया पर नियंत्रण और विरोध प्रदर्शनों का दमन, ये सभी मिलकर उस लोकतांत्रिक ढांचे को खोखला कर देते हैं, जिसका दावा व्यवस्था करती है। मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में लगातार सामने आ रहे दमन के उदाहरण इस सच्चाई को और पुष्ट करते हैं।

आगे का रास्ता: टकराव या परिवर्तन

ईरान के सामने अब दो ही रास्ते हैं। या तो सत्ता प्रतिष्ठान जनाक्रोश को और सख्ती से दबाने की कोशिश करेगा, जिसका परिणाम और अस्थिरता, हिंसा और अलगाव के रूप में सामने आएगा। या फिर वह यह स्वीकार करेगा कि स्थायित्व बंदूक और धर्मादेश से नहीं, बल्कि जनादेश से आता है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण है। केवल प्रतिबंधों पर निर्भर रहना समाधान नहीं है। लोकतांत्रिक दबाव, मानवाधिकारों पर स्पष्ट रुख और ईरानी जनता की वैध आकांक्षाओं का समर्थन ही दीर्घकालिक स्थिरता की दिशा में कदम हो सकता है।

ईरान का संकट दरअसल एक चेतावनी है- कि जब कोई व्यवस्था जनता की आवाज को लगातार अनसुना करती है, तो अंततः वही आवाज सड़कों पर गूंजने लगती है। सुप्रसिद्ध मौलिक विचारक बजरंग मुनि जी अक्सर कहते हैं कि “साम्प्रदायिकता को कभी संतुष्ट नहीं किया जा सकता। उसे सिर्फ कुचला जा सकता है”। सवाल यह नहीं है कि बदलाव आएगा या नहीं, सवाल यह है कि वह शांतिपूर्ण होगा या फिर और कितनी निर्दोष जानों की कीमत पर।

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