वेनेजुएला संकट: लोकतंत्र से सांगठनिक प्रभुत्ववादी तानाशाही तक
“आर्थिक पतन, जनता की त्रासदी और अमेरिकी हस्तक्षेप”
(एक समेकित संपादकीय विश्लेषण)
तेल-समृद्ध वेनेजुएला आज केवल आर्थिक संकट का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक क्षरण और सांगठनिक प्रभुत्ववादी सत्ता-संरचना के गहरे संकट का उदाहरण बन चुका है। यह स्थिति किसी एक नेता की विफलता या बाहरी दबाव का तात्कालिक परिणाम नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक, सुनियोजित और संरचनात्मक रणनीति की परिणति है, जिसमें लोकतंत्र को औपचारिक रूप से बनाए रखते हुए उसकी आत्मा को धीरे-धीरे निष्प्रभावी किया गया।
लोकतांत्रिक असंतोष से वैचारिक सत्ता तक
1990 के दशक के अंत तक वेनेजुएला में लोकतंत्र मौजूद था, लेकिन वह कथित रूप से जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने में विफल रहा। भ्रष्टाचार, असमानता और अभिजात राजनीतिक वर्ग से गहरे मोहभंग ने सामाजिक असंतोष को जन्म दिया। इसी असंतोष को वैचारिक स्वर देकर सत्ता की नई धारा खड़ी की गई।
इस दौर में ह्यूगो चावेज़ ने स्वयं को पुरानी व्यवस्था के विकल्प और जननायक के रूप में प्रस्तुत किया। लोकतंत्र को सुधारने के नाम पर यहां पहला निर्णायक मोड़ आया, जब लोकतंत्र से ऊपर विचारधारा को स्थापित किया गया। यही वह बिंदु था, जहां सुधार की राजनीति धीरे-धीरे प्रभुत्व की राजनीति में बदलने लगी।
संगठन का राज्य में रूपांतरण
सत्ता में आने के बाद राजनीतिक दल एक सामान्य चुनावी मंच नहीं रहा। पार्टी, सरकार और आंदोलन के बीच की रेखाएं जानबूझकर धुंधली की गईं।
पार्टी-निष्ठा योग्यता से ऊपर रखी गई, संगठन से बाहर होना “राज्य-विरोध” जैसा माना जाने लगा और विचारधारा को नैतिक सत्य का दर्जा दिया गया।
यहीं से बहुदलीय प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ती गई और लोकतंत्र एकध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ा।
संस्थाओं का वैचारिक अधिग्रहण
लोकतंत्र की असली परीक्षा संस्थाओं में होती है। इस चरण में रणनीति स्पष्ट थी—संस्थाओं को तोड़ना नहीं, बल्कि उन्हें विचारधारा के अधीन करना।
न्यायपालिका की नियुक्तियों में वैचारिक निष्ठा, चुनाव आयोग का राजनीतिक अनुकूलन, संसद की भूमिका को औपचारिकता तक सीमित करना और सेना को वैचारिक संरक्षक बनाना, इन सबने सत्ता परिवर्तन के संवैधानिक मार्ग को खुला दिखाते हुए व्यावहारिक रूप से बंद कर दिया।
करिश्मे से संरचना तक
चावेज़ के दौर में सत्ता करिश्मे पर टिकी थी। लेकिन असली परिवर्तन उनके बाद हुआ, जब सत्ता व्यक्ति से हटकर संरचना के हाथों में चली गई।
उनके उत्तराधिकारी निकोलस मादुरो व्यक्तिगत रूप से उतने लोकप्रिय नहीं थे, लेकिन अब इसकी आवश्यकता भी नहीं थी। संगठन तैयार था, संस्थाएं नियंत्रित थीं और सेना-सुरक्षा तंत्र सत्ता के प्रति प्रतिबद्ध था। लोकतंत्र यहां पूरी तरह सांगठनिक प्रभुत्व में बदल चुका था।
संकट को शासन का औजार बनाना
आर्थिक पतन सामान्य लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन का कारण बनता है। वेनेजुएला में इसे सत्ता-संरक्षण के औजार में बदला गया।
संकट को बाहरी साजिश बताया गया, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को वैचारिक ढाल बनाया गया और गरीब वर्ग को राज्य-निर्भर रखा गया। नतीजतन, जनता का ध्यान अधिकारों से हटकर केवल जीवित रहने पर केंद्रित हो गया।
भय और वैधता का मिश्रण
यह मॉडल न पूर्ण सैन्य तानाशाही है, न खुला लोकतंत्र। यह एक प्रभुत्ववादी सांगठनिक तानाशाही है, जहां चुनाव होते हैं ताकि वैधता बनी रहे, नियंत्रण इतना मजबूत रहता है कि परिणाम बदलना मुश्किल हो जाए और विरोध मौजूद रहते हुए भी निर्णायक न बन सके। यही इस व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है।
आर्थिक पतन और जनता की बदहाली
कठोर वामपंथी आर्थिक नीतियों, व्यापक राष्ट्रीयकरण और कुप्रबंधन ने उत्पादन क्षमता को कमजोर किया। तेल पर अत्यधिक निर्भरता के बावजूद निवेश और विविधीकरण घटा। महंगाई बेकाबू हुई, मुद्रा का मूल्य गिरा और स्वास्थ्य, बिजली-पानी तथा रोजगार व्यवस्था चरमरा गई।
लाखों लोग देश छोड़ने को मजबूर हुए, जिससे यह लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा प्रवासन संकट बन गया।
नशे का कारोबार और अमेरिकी चिंता
अमेरिकी एजेंसियों का दावा रहा है कि क्षेत्रीय ड्रग-ट्रैफिकिंग नेटवर्क वेनेजुएला मार्ग का इस्तेमाल करते हैं और सत्ता तंत्र के कुछ हिस्सों पर संरक्षण के आरोप हैं। वेनेजुएला सरकार इन आरोपों को नकारती है, लेकिन अमेरिका के लिए यह सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा बना हुआ है।
अमेरिकी हस्तक्षेप: औचित्य और विवाद
अमेरिका का तर्क है कि वेनेजुएला में लोकतंत्र की बहाली, भ्रष्टाचार पर लगाम और नशे के कारोबार से निपटना क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जरूरी है। इसी आधार पर प्रतिबंध, दबाव और कानूनी कदम उठाए गए।
हालांकि यह भी स्पष्ट है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति की कोई वास्तविक गिरफ्तारी नहीं हुई है। आरोप, इनाम घोषणाएं और न्यायिक प्रक्रियाएं अमेरिकी नीति का हिस्सा हैं, जिन्हें वॉशिंगटन जवाबदेही की कार्रवाई बताता है, जबकि कराकस इन्हें संप्रभुता में हस्तक्षेप मानता है।
वेनेजुएला का संकट बहुआयामी है-लोकतंत्र का क्षरण, सांगठनिक प्रभुत्व, आर्थिक विफलता और मानवीय त्रासदी एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं। यह कहानी बताती है कि लोकतंत्र को बिना तोड़े भी खोखला किया जा सकता है।
वेनेजुएला का अनुभव न केवल लैटिन अमेरिका, बल्कि दुनिया के हर लोकतंत्र के लिए चेतावनी है कि जब विचारधारा, संगठन और राज्य के बीच संतुलन टूटता है, तो चुनाव बचे रहते हैं, लेकिन लोकतंत्र दम तोड़ देता है।
