सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: विधवा बहू के अधिकारों पर लगी मुहर, ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण पाना अब संवैधानिक हक
नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने विधवा महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक बड़ा और प्रगतिशील फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि एक विधवा बहू अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण (Maintenance) पाने की पूरी हकदार है। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि इस हक को केवल तकनीकी आधार पर नहीं छीना जा सकता।
’पति की मृत्यु का समय’ अब रुकावट नहीं
अक्सर कानूनी दांव-पेच में यह तर्क दिया जाता था कि यदि पति की मृत्यु ससुर से पहले हुई है, तो बहू का हक बदल जाता है। इस पर जस्टिस की पीठ ने ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा:
”विधवा बहू को सिर्फ इस आधार पर बाहर करना कि उनके पति की मृत्यु ससुर से पहले हुई या बाद में, पूरी तरह से मनमाना है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।”
कोर्ट के फैसले की 3 बड़ी बातें:
समानता का अधिकार: अदालत ने माना कि पति की मृत्यु कभी भी हुई हो, विधवा की वित्तीय जरूरतें और उसके अधिकार नहीं बदलते। भेदभावपूर्ण वर्गीकरण कानून के मकसद को विफल करता है।
तर्कहीन भेदभाव का अंत: पीठ ने कहा कि ऐसी किसी भी शर्त का कानून के उद्देश्य से कोई ‘तर्कसंगत संबंध’ नहीं है। समाज में विधवाओं को सुरक्षा देना कानून की प्राथमिकता है।
मानवीय गरिमा: यह फैसला सुनिश्चित करता है कि पति के न रहने पर एक महिला को बेसहारा न छोड़ा जाए, खासकर तब जब परिवार के पास पैतृक संपत्ति मौजूद हो।
क्या कहता है कानून?
यह आदेश हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम (1956) की व्याख्या को और मजबूत करता है। अब कोई भी ससुर इस आधार पर बहू को भरण-पोषण देने से मना नहीं कर पाएगा कि उसके बेटे की मृत्यु पहले हो गई थी।
विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला उन हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो पति की मौत के बाद संपत्ति विवाद और सामाजिक बहिष्कार का सामना करती हैं। यह निर्णय पितृसत्तात्मक व्यवस्था में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक ‘माइलस्टोन’ साबित होगा।

