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खौफ के साये से बाहर निकला अबूझमाड़, बंदूकों की जगह अब बिछ रहा सड़कों का जाल

नारायणपुर | छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग का सबसे दुर्गम और ‘अनसुलझा रहस्य’ माना जाने वाला क्षेत्र अबूझमाड़ आज एक ऐतिहासिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। दशकों तक नक्सली आतंक और भय का प्रतीक रहे इस माड़ क्षेत्र में अब विकास की नई इबारत लिखी जा रही है। 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद के खात्मे की केंद्रीय घोषणा के बाद, यहाँ की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।

“अब हम खड़े होकर बात कर सकते हैं”

झारावाही ग्राम पंचायत के निवासी लच्छू राम कोर्राम उन दिनों को याद करते हैं जब यहाँ नक्सलियों का समानांतर शासन चलता था। वे बताते हैं, “पहले नक्सली खुलेआम बंदूक लेकर वैसे ही घूमते थे जैसे आज सुरक्षा बल। लेकिन आज स्थिति अलग है, अब हम निडर होकर अपनी बात रख पा रहे हैं।” ग्रामीणों का कहना है कि नक्सलियों के सरेंडर और सुरक्षा बलों की पैठ बढ़ने से विकास कार्यों में तेजी आई है।

कनेक्टिविटी: विकास की नई जीवनरेखा

नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन के अनुसार, अबूझमाड़ को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सड़कों का एक विशाल नेटवर्क तैयार किया जा रहा है।

प्रमुख परियोजनाएं और उनकी स्थिति:

  • NH-130D: यह राष्ट्रीय राजमार्ग कोंडागांव-नारायणपुर से होते हुए महाराष्ट्र सीमा तक जाएगा, जो क्षेत्र की आर्थिक रीढ़ बनेगा।
  • अंतरराज्यीय संपर्क: नारायणपुर से पदमपुर-नीलांबुर मार्ग (112 किमी) सीधे महाराष्ट्र को जोड़ेगा।
  • पड़ोसी जिलों से जुड़ाव: ‘सोनपुर-मरोड़ा-पांगुड़ रोड’ कांकेर को और ‘आदेर-ओरछा-लंका रोड’ बीजापुर (भैरमगढ़) को जोड़ेगी।
  • जनमन योजना: इस योजना के तहत 22 नई सड़कों समेत कुल 30 सड़कों का निर्माण किया जा रहा है।

बदलती जीवनशैली: बैलगाड़ी से ट्रैक्टर तक का सफर

सड़कों के आने से केवल आवागमन ही सुगम नहीं हुआ, बल्कि इसका सीधा असर ग्रामीणों के जीवन स्तर पर पड़ा है। ग्रामीण गूंजा राम और फागू राम बताते हैं कि सड़क बनने से अब लोग बाइक और ट्रैक्टर खरीदने लगे हैं। पहले जहाँ इलाज के अभाव में लोग दम तोड़ देते थे, अब एम्बुलेंस और स्वास्थ्य सुविधाएं गांव तक पहुँच रही हैं।

प्रशासन का विजन: अंतिम छोर तक विकास

कलेक्टर नम्रता जैन ने स्पष्ट किया कि इन सड़कों के बनने से केवल दूरी कम नहीं होगी, बल्कि बिजली, मोबाइल नेटवर्क और राशन (PDS) जैसी बुनियादी सुविधाएं भी हर घर तक पहुँचेंगी। नक्सल प्रभाव के कारण जो सरकारी योजनाएं वर्षों से बाधित थीं, वे अब सीधे आदिवासियों के दरवाज़े पर हैं।


निष्कर्ष: अबूझमाड़ अब केवल एक भौगोलिक नाम नहीं, बल्कि बदलते छत्तीसगढ़ की पहचान बन रहा है। पक्की सड़कें यहाँ के आदिवासियों के लिए केवल रास्ता नहीं, बल्कि शिक्षा और समृद्धि का द्वार साबित हो रही हैं।

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