छत्तीसगढ़ कर्मचारी-अधिकारी फेडरेशन की 11 सूत्रीय मांगों को लेकर तीन दिवसीय कलम-बंद हड़ताल, सरकारी कामकाज ठप
रायपुर।
छत्तीसगढ़ कर्मचारी-अधिकारी फेडरेशन की 11 सूत्रीय मांगों के समर्थन में 29, 30 और 31 दिसंबर को आह्वान की गई काम-बंद, कलम-बंद हड़ताल का व्यापक असर देखने को मिला। राज्य के सभी पांचों संभागों में सरकारी कार्यालयों में कामकाज पूरी तरह ठप रहा। दैनिक वेतनभोगी और संविदा कर्मचारियों को छोड़कर अधिकांश विभागों में अधिकारी-कर्मचारी अनुपस्थित रहे, जिससे आम नागरिकों को आवश्यक कार्यों के लिए भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा।
हड़ताल के कारण राजस्व, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास सहित कई विभागों में फाइलों का निपटारा नहीं हो सका। दूर-दराज से आए लोगों को बिना काम कराए लौटना पड़ा। फेडरेशन का कहना है कि यह आंदोलन पूर्व में सरकार द्वारा गठित पिंगुआ समिति की 2020-21 की रिपोर्टों के आधार पर लंबित मांगों के निराकरण के लिए किया जा रहा है, जिन पर अब तक ठोस अमल नहीं हुआ।
फेडरेशन ने स्पष्ट किया कि कर्मचारियों-अधिकारियों की मांगें केवल वेतन वृद्धि तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सेवा-शर्तों में सुधार, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी बुनियादी जरूरतों से संबंधित हैं। संगठन का आरोप है कि केंद्र के समान महंगाई भत्ता, डीए एरियर का भुगतान, समयमान वेतनमान और वेतन-विसंगतियों के समाधान जैसे मुद्दे लंबे समय से लंबित हैं।
11 सूत्रीय मांगों का संक्षेप
फेडरेशन की प्रमुख मांगों में केंद्र के समान डीए का पूर्ण और समय पर भुगतान, लंबित डीए एरियर का निपटारा, चार-स्तरीय समयमान वेतनमान, विभिन्न संवर्गों की वेतन-विसंगतियों के समाधान के लिए पिंगुआ समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक कर लागू करना, पंचायत सचिवों का शासकीयकरण, कैशलेस चिकित्सा सुविधा, अनुकंपा नियुक्ति में 10 प्रतिशत सीमा में शिथिलता, अर्जित अवकाश के नगदीकरण की सीमा 300 दिन करना, तथा दैनिक वेतनभोगी और संविदा कर्मियों के नियमितीकरण के लिए स्पष्ट नीति शामिल है।
फेडरेशन ने चेतावनी दी है कि यदि मांगों पर शीघ्र और समयबद्ध निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। वहीं, प्रशासन की ओर से आवश्यक सेवाओं को बहाल रखने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन हड़ताल के चलते जनजीवन पर असर बना हुआ है।
