संघ का नया संकेत: आरक्षण पर बदला स्वर या व्यापक सामाजिक रणनीति?
मोहन भागवत का हालिया वक्तव्य— “हिंदू समाज के एक हिस्से को 200 वर्ष भी आरक्षण देना पड़े तो अनुचित नहीं”—भारतीय सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देता है। लंबे समय तक आरक्षण के प्रश्न पर आलोचना और आशंकाओं से घिरे रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए यह बयान केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं, बल्कि सार्वजनिक धारणा के स्तर पर एक नई स्थिति-निर्माण की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
देहरादून में दिए गए इस वक्तव्य में भागवत ने स्पष्ट किया कि जब तक समाज में भेदभाव है, तब तक आरक्षण की आवश्यकता बनी रहेगी। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इसका संचालन पूर्णतः संविधान की मर्यादा में होना चाहिए। यह दोहरा आग्रह—सामाजिक न्याय की स्वीकृति और संवैधानिक अनुशासन का समर्थन—संघ के वैचारिक प्रस्तुतीकरण में संतुलन स्थापित करने का प्रयास प्रतीत होता है।
पिछले वर्षों में संघ पर यह आरोप लगता रहा है कि वह आरक्षण के प्रति पूरी तरह सहज नहीं है। 2015 में आरक्षण नीति की “समीक्षा” संबंधी बयान ने व्यापक राजनीतिक विवाद को जन्म दिया था। उस समय विपक्ष ने इसे सामाजिक न्याय की अवधारणा के प्रति संदेह के रूप में प्रस्तुत किया। इसके विपरीत, वर्तमान वक्तव्य आरक्षण की अवधि पर कोई सीमाबद्ध शर्त नहीं लगाता, बल्कि भेदभाव-समाप्ति तक उसके औचित्य को स्वीकार करता है। यह परिवर्तन महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे संघ स्वयं को सामाजिक न्याय की संवैधानिक अवधारणा के अधिक निकट स्थापित करता दिखता है।
हालाँकि, इस पूरे विमर्श का एक गहरा आयाम संविधान और तंत्र के संबंध से जुड़ा है। यदि आरक्षण संविधान की देन है, तो उसका भविष्य भी संवैधानिक प्रक्रिया से ही निर्धारित होगा। किंतु यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या तंत्र—जो स्वयं संविधान से अपनी वैधता प्राप्त करता है—उसी संविधान में असीमित संशोधन का अधिकार रखे? लोकतंत्र में शक्ति का संतुलन अत्यंत आवश्यक है। यदि संशोधन प्रक्रिया अत्यधिक सरल या केवल संख्यात्मक बहुमत पर आधारित हो जाए, तो दीर्घकाल में तंत्र के निरंकुश होने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता।
इसलिए संविधान संशोधन का अधिकार उत्तरदायित्व के साथ जुड़ा होना चाहिए—कठोर प्रक्रिया, व्यापक सामाजिक सहमति और न्यायिक संतुलन के माध्यम से। संविधान केवल सत्ता-संचालन का दस्तावेज नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता और मूलाधिकारों का संरक्षक है। तंत्र को उसके अधीन रहकर कार्य करना चाहिए, न कि उसे अपने अनुरूप ढालने की प्रवृत्ति विकसित करनी चाहिए।
संघ और भागवत के नए स्वर को इसी व्यापक संदर्भ में समझना होगा। यदि यह परिवर्तन वास्तविक सामाजिक समरसता की दिशा में है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। किंतु सामाजिक न्याय केवल वक्तव्यों से नहीं, नीतिगत निरंतरता और संवैधानिक प्रतिबद्धता से सिद्ध होता है।
अंततः, आरक्षण की बहस संघ की छवि-परिवर्तन या राजनीतिक समीकरणों तक सीमित नहीं है। यह उस मूल प्रश्न से जुड़ी है कि लोकतंत्र में संविधान सर्वोपरि रहेगा या तंत्र सर्वोच्च बनने की आकांक्षा करेगा। यदि संघ का नया रुख संविधान-केन्द्रित और समावेशी समाज की दिशा में ठोस कदम बनता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत होगा। किंतु सजग नागरिकता ही सुनिश्चित करेगी कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक संतुलन दोनों सुरक्षित रहें।
