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किसान की आज़ादी : नीति और व्यवहार का विरोधाभास

सरकारें लगातार यह दावा कर रही हैं कि किसान अपनी उपज कहीं भी और किसी को भी बेच सकता है। यह बात सुनने में आकर्षक लगती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे अलग तस्वीर पेश करती है।

छत्तीसगढ़ में धान का बाजार मूल्य लगभग ₹24 प्रति किलो है, जबकि राज्य सरकार किसानों से ₹31 प्रति किलो की दर से धान खरीद रही है। स्वाभाविक है कि किसान अधिक मूल्य देने वाले विकल्प को चुने। ऐसे में “कहीं भी बेचने की आज़ादी” व्यवहार में केवल औपचारिक घोषणा बनकर रह जाती है।

यही विरोधाभास गन्ने के मामले में और स्पष्ट हो जाता है। जब किसान गुड़ उत्पादक उद्योगों को गन्ना बेचना चाहता है, जहां उसे अधिक मूल्य मिल रहा है, तब सरकार प्रतिबंध लगा देती है। इसके विपरीत, चीनी मिलों को कम मूल्य पर गन्ना उपलब्ध कराने की व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाती है।

यह स्थिति एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती है। यदि किसान को वास्तव में बाजार की स्वतंत्रता दी गई है, तो अधिक मूल्य देने वाले खरीदार तक पहुंच पर रोक क्यों? क्या किसान की आज़ादी केवल वहीं तक सीमित है, जहां उससे कम दाम पर उपज खरीदी जा सके?

कृषि नीति का उद्देश्य किसान की आय बढ़ाना होना चाहिए, न कि किसी एक उद्योग को संरक्षण देना। जब तक नीति और व्यवहार के इस अंतर को दूर नहीं किया जाता, तब तक किसान की आज़ादी का दावा अधूरा ही माना जाएगा।

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