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छत्तीसगढ़ सेक्स सीडी कांड: पूर्व CM भूपेश बघेल की मुश्किलें बढ़ीं, सेशन कोर्ट ने पलटा निचली अदालत का फैसला

​रायपुर | छत्तीसगढ़ के सबसे चर्चित और विवादित ‘कथित सेक्स सीडी कांड’ में रविवार को एक बड़ा न्यायिक उलटफेर देखने को मिला। रायपुर सेशन कोर्ट ने सीबीआई (CBI) की विशेष अदालत के मार्च 2025 के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को सभी धाराओं से दोषमुक्त कर दिया गया था।
​सेशन कोर्ट ने सीबीआई की रिव्यु पिटीशन (पुनरीक्षण याचिका) को स्वीकार करते हुए निर्देश दिया है कि अब भूपेश बघेल सहित सभी आरोपियों को कोर्ट में नियमित रूप से पेश (ट्रायल) होना होगा।
​सेशन कोर्ट के फैसले की 3 बड़ी बातें:
​ट्रायल का सामना: कोर्ट ने माना कि आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं।
​आरोप मुक्ति की अर्जी खारिज: आरोपी कारोबारी कैलाश मुरारका और विनोद वर्मा की खुद को आरोप मुक्त करने वाली याचिकाएं खारिज कर दी गईं।
​सीबीआई की जीत: निचली अदालत द्वारा बघेल को क्लीन चिट दिए जाने के फैसले को सत्र न्यायालय ने अपर्याप्त मानते हुए निरस्त कर दिया।
​मामले के मुख्य आरोपी
​अब इस केस में ट्रायल का सामना करने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल हैं:
​भूपेश बघेल: पूर्व मुख्यमंत्री और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष।
​विनोद वर्मा: पूर्व मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार।
​कैलाश मुरारका: कारोबारी।
​विजय भाटिया एवं विजय पांडेय।
​क्या था यह ‘सीडी कांड’ और इसका राजनीतिक असर?
​यह मामला अक्टूबर 2017 में तब शुरू हुआ जब बीजेपी नेता प्रकाश बजाज ने ब्लैकमेलिंग और अश्लील वीडियो के आधार पर उगाही की FIR दर्ज कराई। जांच के तार दिल्ली तक जुड़े और विनोद वर्मा की गिरफ्तारी हुई।
​2018 का ‘मैं भी भूपेश’ आंदोलन: चुनाव से ठीक 3 महीने पहले जब सितंबर 2018 में भूपेश बघेल की गिरफ्तारी हुई, तो उन्होंने जमानत लेने से इनकार कर दिया। जेल से ही उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भरा और “मैं भी भूपेश हूं” का नारा राज्यव्यापी आंदोलन बन गया।
​सत्ता परिवर्तन की धुरी: विश्लेषकों का मानना है कि इस कांड और उसके बाद हुए प्रदर्शनों ने कांग्रेस को वह राजनीतिक खाद दी, जिससे 2018 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 68 सीटों के साथ बंपर जीत हासिल की।
​दुखद पहलू: रिंकू खनूजा की आत्महत्या
​इस हाई-प्रोफाइल केस की जांच के दौरान एक आरोपी रिंकू खनूजा ने आत्महत्या कर ली थी, जिससे मामला और भी ज्यादा पेचीदा हो गया था। अब लगभग 8 साल बाद, सेशन कोर्ट के इस फैसले ने फिर से कानूनी और राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
​न्यायिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रायल शुरू होने के बाद पेश होने वाले साक्ष्य छत्तीसगढ़ की आने वाली राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।

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