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विशेष रिपोर्ट: मुंबई की सड़कों पर फ्रांस के राष्ट्रपति की ‘सादगी’ या सत्ता का ‘आत्मविश्वास’?

मुंबई | कल सुबह जब मुंबई के मरीन ड्राइव पर आम नागरिक रोज़ाना की तरह जॉगिंग कर रहे थे, तो उनके बीच एक ऐसा चेहरा था जिसे देख हर कोई दंग रह गया। नीली टी-शर्ट और शॉर्ट्स में पसीने से तर-बतर यह शख्स कोई आम विदेशी पर्यटक नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में से एक, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों थे।

बिना किसी भारी-भरकम सुरक्षा काफिले के, बिना सड़कों को ब्लॉक किए और बिना दर्जनों सायरन बजाती गाड़ियों के, मैक्रों का मुंबई की भीड़ के बीच दौड़ना चर्चा का विषय बना हुआ है। उनके आगे-पीछे बस दो-तीन सुरक्षाकर्मी थे, जो भीड़ में इस तरह घुले-मिले थे कि उन्हें पहचानना भी मुश्किल था।

सत्ता का मनोविज्ञान: प्रदर्शन बनाम आत्मविश्वास
मैक्रों का यह अंदाज भारतीय राजनीति के लिए एक बड़े आईने जैसा है। हमारे देश में एक छोटे स्तर का नेता भी जब निकलता है, तो ट्रैफिक जाम और सुरक्षा का ऐसा आडंबर रचा जाता है जैसे कोई बड़ा संकट आने वाला हो।

विशेषज्ञों का मानना है कि ताकत का असली मापदंड उसके प्रदर्शन में नहीं, बल्कि उसकी स्वाभाविकता में होता है। जहां सुरक्षा कवच जितना छोटा होता है, वहां नेता का अपनी जनता और व्यवस्था पर आत्मविश्वास उतना ही बड़ा दिखाई देता है। फ्रांस, जो एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है, वीटो पावर रखता है और नाटो का प्रमुख स्तंभ है—उसका राष्ट्राध्यक्ष अगर मुंबई में सुरक्षित महसूस कर रहा है, तो यह महाराष्ट्र सरकार और भारतीय सुरक्षा तंत्र के लिए गर्व की बात है, लेकिन यह हमारे नेताओं के ‘VIP कल्चर’ पर एक तीखा सवाल भी है।

क्या सुपरपावर देशों के नेता ऐसा कर सकते हैं?
मैक्रों की इस सादगी के बाद अब यह बहस छिड़ गई है कि क्या अमेरिका या चीन के राष्ट्रपति भी ऐसा कर सकते हैं?

अमेरिका: अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा (Secret Service) का प्रोटोकॉल इतना जटिल है कि वे चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकते। चार राष्ट्रपतियों की हत्या का इतिहास और वैश्विक खतरों के कारण अमेरिका अपने नेता को एक ‘चलते-फिरते किले’ (The Beast) में रखता है।

चीन: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए शक्ति का अर्थ ही ‘नियंत्रण’ है। वहां नेतृत्व और जनता के बीच की दूरी को ही सम्मान का प्रतीक माना जाता है, इसलिए वहां ऐसी स्वाभाविकता की उम्मीद करना बेमानी है।

निष्कर्ष
फ्रांस ने दिखाया है कि असली शक्ति को शोर की ज़रूरत नहीं होती। मैक्रों की जॉगिंग ने यह संदेश दिया है कि जहाँ असुरक्षा होती है, वहीं काफिला लंबा होता है। असली शक्तिशाली वही है, जो बिना किसी ढकोसले के भी शक्तिशाली महसूस करे और अपनी जनता के बीच सहज रहे।

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