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शीर्ष माओवादी कमांडर देवजी का आत्मसमर्पण: नक्सलवाद की समाप्ति की ओर एक और बड़ा कदम

हैदराबाद/रायपुर, 23 फरवरी 2026: देश के नक्सलवाद-विरोधी अभियान में एक और बड़ा पल आया है। प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) के वरिष्ठ नेता और संगठन के रणनीतिकार थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी ने 22 फरवरी को तेलंगाना पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। उन्हें करीब एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था और वे माओवादी सशस्त्र संघर्ष में लंबे समय से शीर्ष भूमिका निभा रहे थे। उनके साथ कई अन्य कैडर भी हथियार डाल चुके हैं।

आत्मसमर्पण की पृष्ठभूमि

देवजी नक्सली आंदोलन के केंद्रीय कमिटी सदस्य और प्रचारित तौर पर सीपीआई (माओवादी) के जनरल सेक्रेटरी के पद पर कार्यरत थे, जिन्होंने 2025 में पूर्व नेता के निधन के बाद संगठन के नेतृत्व की कमान संभाली थी। उनकी गिरफ्तारी या आत्मसमर्पण सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों के लिए कई वर्षों से प्राथमिक लक्ष्य रहा है।

उनके आत्मसमर्पण के पीछे सुरक्षा बलों का लगातार दबाव, लंबी अभियान रणनीतियाँ और संगठन के भीतर नेतृत्व व कैडर गिरावट को मुख्य वजह बताया जा रहा है। हालिया महीनों में वरिष्ठ नेताओं के आत्मसमर्पणों और खुफिया सफलताओं ने माओवादी संघर्ष को कमजोर किया है।

आंदोलन पर असर

देवजी के आत्मसमर्पण को माओवादी संगठन की केंद्रीय कमान के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। संगठन के मुख्य रणनीतिकार के बाहर होने से न केवल नेतृत्व का vacuum पैदा हुआ है, बल्कि समर्पण की लहर भी प्रेरित हुई है। इसके साथ ही अन्य वरिष्ठ कमांडर मल्ला राजिरेड्डी सहित कई कैडरों ने भी हथियार रख दिए हैं।

विश्लेषकों के अनुसार संगठन की सक्रिय सेंट्रल कमिटी और मिलिट्री विंग पहले से कमजोर पड़ चुकी थी और अब आत्मसमर्पणों के साथ यह गिरावट और तेज हुई है। इस परिदृश्य को देखते हुए यह कहा जा रहा है कि नक्सलवादी हिंसा को समाप्त करने के लिए सुरक्षा अभियान लक्ष्य के करीब पहुंच रहा है।

सरकारी प्रतिक्रिया

छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ने इस आत्मसमर्पण को नक्सलवाद के खिलाफ “ऐतिहासिक सफलता” बताया है। उन्होंने कहा है कि मार्च 2026 तक नक्सलवाद के समाप्ति के लक्ष्य की दिशा में कदम बढ़े हैं और सुरक्षा बलों के प्रयासों से नक्सल इलाकों में सीधी प्रगति दिख रही है।

मानवीय पहलू

इस घटना का एक मानवीय पक्ष भी सामने आया है। देवजी के आत्मसमर्पण के कारण उनके परिवार में खुशी की लहर देखी जा रही है, क्योंकि कई वर्षों बाद वे अपने प्रियजन से मिलने की उम्मीद रखते हैं। उनका परिवार इस बदलाव को सकारात्मक मान रहा है।

आगे का रास्ता

देश भर में नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बल सक्रिय हैं और आत्मसमर्पणों के साथ ही संगठनात्मक ढांचे पर दबाव बना हुआ है। हालांकि कुछ छोटे समूह अभी भी सक्रिय हैं, विशेषज्ञों का मानना है कि शीर्ष नेतृत्व की अनुपस्थिति आंदोलन की क्षमता को और कम करेगी।

निष्कर्ष: देवजी का आत्मसमर्पण सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत में नक्सलवाद के खिलाफ लंबे समय से चले आ रहे अभियान में एक प्रमुख मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि नक्सलवाद खत्म करने की दिशा में सरकार और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा निर्धारित लक्ष्य और रणनीति साकार रूप ले रही है।

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