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​सत्ता और सूचना के बदलते समीकरण: ‘दबंगई’ और ‘मेनस्ट्रीम मीडिया’ के ढलते सूरज की कहानी : समाजविज्ञानी बजरंग मुनि

​नई दिल्ली: भारतीय समाज और राजनीति एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ ​सत्ता और सूचना के बदलते समीकरण: ‘दबंगई’ और ‘मेनस्ट्रीम मीडिया’ के ढलते सूरज की कहानी दौर के स्थापित प्रतिमान ताश के पत्तों की तरह ढह रहे हैं। कभी राजनीति में ‘दादागिरी’ और मीडिया में ‘एकतरफा संवाद’ का बोलबाला था, लेकिन आज तकनीक और जन-जागरूकता ने इस पूरे तंत्र को पलट कर रख दिया है।
​1. राजनीति: बाहुबल से साख की ओर
​एक दौर था जब क्षेत्रीय राजनीति में ‘दबंगई’ को नेतृत्व का अनिवार्य गुण माना जाता था। लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और बाल ठाकरे जैसे नेताओं ने अपने आक्रामक तेवरों से सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ीं। लेकिन आज परिदृश्य बदल चुका है।
​विरासत बनाम योग्यता: अब जनता केवल ‘सरनेम’ या पिता की विरासत के आधार पर सम्मान देने को तैयार नहीं है। यही कारण है कि विरासत में मिली राजनीति करने वाले उत्तराधिकारियों की स्वीकार्यता लगातार घट रही है।
​दबंगई की एक्सपायरी डेट: आज का वोटर अब ‘डर’ से नहीं, ‘डिलीवरी’ से प्रभावित होता है। अब नेता की पहचान उसके रिपोर्ट कार्ड से होती है, उसके बाहुबल से नहीं।
​2. मीडिया: टीवी की ‘चीख-पुकार’ से जनता की बेरुखी
​प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, जो कभी सूचना के ‘सुप्रीम कोर्ट’ माने जाते थे, आज अपनी विश्वसनीयता के संकट से जूझ रहे हैं।
​अखबारों का घटता आकर्षण: कभी अखबार में नाम छपना ‘भगवान मिलने’ जैसा था, लेकिन आज की डिजिटल पीढ़ी के लिए यह केवल रद्दी का एक टुकड़ा मात्र रह गया है।
​टीवी डिबेट्स का ‘तमाशा’: टीवी चैनलों पर हाथ उठा-उठाकर चिल्लाना और शोर मचाना अब लोगों को जानकारी कम और ‘नाटकबाजी’ ज्यादा लगने लगा है। टीआरपी की इस अंधी दौड़ ने गंभीर चर्चाओं को निर्जीव कर दिया है, जिससे दर्शक अब नफरत करने लगे हैं।
​3. सोशल मीडिया: सूचना का नया लोकतंत्र
​इस पूरे बदलाव के केंद्र में ‘सोशल मीडिया’ है। इसने संवाद की दूरियों को खत्म कर दिया है।
​झूठ की उम्र हुई कम: पहले किसी विमर्श (Narrative) को झूठ के सहारे स्थापित करना आसान था, क्योंकि सूचना के स्रोत सीमित थे। आज सोशल मीडिया पर ‘फैक्ट चेक’ और ‘सीधा संवाद’ इतनी तेजी से होता है कि झूठ को पैर पसारने का मौका ही नहीं मिलता।
​आम आदमी का मंच: अब जनता को अपनी बात कहने के लिए किसी संपादक या चैनल हेड के अप्रूवल की जरूरत नहीं है। हर नागरिक खुद में एक मीडिया हाउस बन चुका है।
​4. भविष्य की चुनौती: स्वतंत्रता पर पहरा?
​वर्तमान राजनीतिक दल सोशल मीडिया की इस बेलगाम ताकत से घबराए हुए हैं। यही कारण है कि इसे नियंत्रित करने और विभिन्न प्रतिबंध लगाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। लेकिन जानकारों का मानना है कि जब तक कोई गतिविधि आपराधिक श्रेणी में न आए, तब तक सोशल मीडिया को पूरी तरह स्वतंत्र छोड़ना ही लोकतंत्र के हित में है।
​संपादकीय टिप्पणी:
कुल मिलाकर, भारत ‘इंफॉर्मेशन कंट्रोल’ के दौर से निकलकर ‘इंफॉर्मेशन फ्रीडम’ के दौर में प्रवेश कर चुका है। अब न तो राजनीति में लाठी चलेगी और न ही मीडिया में एकतरफा झूठ; अब केवल वही टिकेगा जो पारदर्शी और जवाबदेह होगा।

    बजरंग मुनि.....✍️

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