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एपस्टीन फाइल्स: यौनाचार नहीं, सत्ता, भय और सांगठनिक पाखंड की कथा

जेफ्री एपस्टीन फाइल्स को केवल यौनाचार या नैतिक विचलन के रूप में देखना इस पूरे प्रकरण को सतही बना देना है। यह मामला मनुष्य की व्यक्तिगत कमजोरियों से कहीं आगे जाकर संगठन, सत्ता, भय और वैश्विक राजनीति के गहरे तंत्र को उजागर करता है। शनिवार की रात मां संस्थान की ज़ूम पर होने वाले चर्चा कार्यक्रम में इसी महत्वपूर्ण विषय पर गंभीर चर्चा हुई। लगभग 20 विद्वानों की सक्रिय उपस्थिति के साथ बहुत बारीकी से इस विषय पर चर्चा किया गया। प्रस्तुत लेख क्रमशः समाजशास्त्री पवनंजय त्रिपाठी जी, संजय तिवारी जी और मेरे यानी ज्ञानेंद्र आर्य के तर्कों के आधार पर लिखा गया है।

सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि दैहिक संबंध मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। भूख, क्रोध और भोग सामान्य मानवीय लक्षण हैं। भारतीय दर्शन ने इन्हें कभी अस्वाभाविक या पाप नहीं कहा। समस्या वहाँ उत्पन्न होती है, जहाँ इन प्रवृत्तियों पर संयम समाप्त हो जाता है और वे मस्तिष्क पर अधिकार कर लेती हैं। जब धन और वासना अपने स्वाभाविक स्थान से उठकर सोच को नियंत्रित करने लगते हैं, तब व्यक्ति अंधा हो जाता है। उसकी भूख कभी समाप्त नहीं होती और वही स्थिति उसे कुत्सित कर्मों की ओर ले जाती है।

एपस्टीन का मामला केवल वयस्कों की सहमति का प्रश्न नहीं है। यहाँ सबसे भयावह तथ्य नाबालिग बच्चियों का संगठित शोषण है। 9, से 14 वर्ष की बच्चियों को प्रभावशाली लोगों के सामने वस्तु की तरह प्रस्तुत किया गया। यह न नैतिक बहस का विषय है और न निजी स्वतंत्रता का। यह स्पष्ट और गंभीर अपराध है, जिस पर किसी प्रकार का तर्क स्वीकार्य नहीं किया जा सकता।

 

अब प्रश्न उठता है कि एपस्टीन फाइल्स का संकलन क्यों हुआ और अब उन्हें सार्वजनिक क्यों किया जा रहा है।

यहाँ “हमाम में सभी नंगे हैं” वाली कहावत पूरी तरह लागू होती है। इन फाइल्स का मूल उद्देश्य किसी एक व्यक्ति को दंडित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी खुद को नैतिक रूप से श्रेष्ठ न घोषित कर सके। बड़े राजनेता, उद्योगपति, राजघराने और सार्वजनिक जीवन के प्रतिष्ठित चेहरे किसी न किसी रूप में इस दायरे में रहे। उनके फोटो, वीडियो और यात्रा रिकॉर्ड संकलित किए गए ताकि सब दागदार दिखें और कोई किसी पर उंगली न उठा सके। यह एक तरह से अपराध का सामान्यीकरण की प्रक्रिया के तहत हुआ है।

 

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ये फाइल्स 2025 में ही क्यों सामने लाई गईं।

अमेरिका की डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टियाँ सामान्यतः किसी भी आंतरिक मुद्दे पर एकमत नहीं होतीं। इतिहास गवाह है कि वे केवल राष्ट्र सुरक्षा जैसे मामलों में ही साथ आती हैं। इसके बावजूद, एपस्टीन फाइल्स को सार्वजनिक करने पर दोनों दलों का एक साथ आना यह संकेत देता है कि यह मामला केवल नैतिक या कानूनी नहीं, बल्कि रणनीतिक और राष्ट्रीय नीति से जुड़ा हुआ है।

आज अमेरिका वैश्विक स्तर पर कई चुनौतियों से जूझ रहा है। बढ़ता सरकारी कर्ज, डॉलर की विश्वसनीयता पर दबाव, चीन द्वारा वैकल्पिक व्यापार और मुद्रा व्यवस्था की पहल, और नए वैश्विक शक्ति संतुलन की सुगबुगाहट—इन सबके बीच वैश्विक प्रभाव बनाए रखना केवल भाषणों से संभव नहीं है।

वैश्विक राजनीति में प्रभाव भय और रहस्यों से बनता है।

एपस्टीन फाइल्स का चयनात्मक खुलासा कोई दुर्घटना नहीं है। कुछ नामों को सामने लाना, कुछ को समय-समय पर छेड़ना और कुछ को पूरी तरह सुरक्षित रखना एक संकेत है—एक याद दिलाना कि किसी का नाम कभी भी उजाले में लाया जा सकता है। इसका असर तुरंत दिखता है। दुनिया की हर राजधानी में चिंता फैल जाती है—कहीं मेरा नाम तो नहीं, कहीं मेरे किसी सहयोगी का नाम तो नहीं।

यह खुला ब्लैकमेल नहीं है, बल्कि “पारदर्शिता” के आवरण में किया गया भय का प्रदर्शन है। बिना प्रतिबंध लगाए, बिना युद्ध किए, केवल डर के माध्यम से वैश्विक नियंत्रण की रणनीति।

इस पूरे प्रकरण का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—सांगठनिक धर्म और आदर्शवाद का पाखंड। जब संगठन अपने अस्तित्व और वर्चस्व के लिए सच और झूठ से परे जाकर नैतिकता के मानक गढ़ते हैं, तब सही और गलत का निर्णय आचरण से नहीं, बल्कि “अपना” और “पराया” होने से तय होता है। आदर्शवाद इतना भारी हो जाता है कि यथार्थ दम तोड़ देता है।

जीवन आदर्श नहीं है। जीवन एक प्रवाह है। गृहस्थ और सन्यासी के नियम अलग होते हैं। वयस्कों के बीच स्पष्ट सहमति से बने संबंध अपराध नहीं हैं। अपराध वहाँ है जहाँ सहमति संभव ही नहीं, जहाँ नाबालिग शामिल हों, जहाँ दबाव और शोषण हो।

एपस्टीन फाइल्स हमें यही चेतावनी देती हैं कि जब धन, वासना और सत्ता एक साथ मस्तिष्क पर सवार हो जाएँ, तब व्यक्ति नहीं, पूरे तंत्र विकृत हो जाते हैं। और जब तंत्र विकृत होता है, तब शोषण व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संगठित रूप ले लेता है।

यह मामला केवल कुछ नामों का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जो भय, रहस्य और पाखंड के सहारे दुनिया को नियंत्रित करना चाहती है।

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