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UGC इक्विटी नियम: समावेशिता के नाम पर गलत दिशा की ओर जाती नीति?

किसी भी शासन व्यवस्था का मूल्यांकन केवल उसके इरादों या क्रियान्वयन की गति से नहीं किया जा सकता, बल्कि उस दर्शन से किया जाना चाहिए जिस पर वह आधारित है। एक साधारण उदाहरण से समझें तो सरकार चुनना अच्छी और महंगी गाड़ी खरीदने जैसा है। गाड़ी तेज़ है, चालक कुशल है, लेकिन यदि सड़क ही गलत दिशा में जाती हो, तो वह गाड़ी आपको सही गंतव्य तक नहीं पहुँचा सकती।

UGC के नए इक्विटी नियम इसी प्रकार की एक सड़क हैं, जिन पर बहस लेन की चौड़ाई, स्पीड ब्रेकर और समिति की संरचना तक सीमित है, जबकि असली प्रश्न यह है कि यह सड़क जाती कहाँ है।

जनवरी 2026 में अधिसूचित UGC के इक्विटी नियम उच्च शिक्षा परिसरों में जातिगत भेदभाव समाप्त करने के उद्देश्य से लाए गए। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और पूर्व की घटनाओं का हवाला देकर इन्हें नैतिक वैधता प्रदान की गई, लेकिन इन नियमों ने प्रशासनिक से अधिक वैचारिक विवाद खड़ा कर दिया है।

 

सरकार की संशय से मजबूरी तक की यात्रा

UGC के प्रारंभिक ड्राफ्ट में यह प्रावधान था कि यदि कोई शिकायत झूठी या दुर्भावनापूर्ण पाई जाती है, तो उस पर दंडात्मक कार्रवाई होगी। यह प्रावधान अंतिम अधिसूचना से हटा दिया गया।

यह परिवर्तन केवल नीति-निर्माण का तकनीकी निर्णय नहीं था, बल्कि स्पष्ट रूप से राजनीतिक दबाव का परिणाम था।

दिसंबर 2025 में संसद की स्थायी समिति ने SC/ST के साथ OBC को भी इन नियमों में शामिल करने की सिफारिश की। समिति की रिपोर्ट को नज़रअंदाज़ करना संसद में सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता था। परिणामस्वरूप सरकार ने इसे “संसदीय प्रक्रिया” का हिस्सा बताया, लेकिन वस्तुतः यह एक राजनीतिक मजबूरी बन गई।

 

OBC समावेश और सत्ता का गणित

OBC को इक्विटी नियमों में शामिल करना सामाजिक से अधिक राजनीतिक निर्णय प्रतीत होता है। जनसंख्या के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाले इस वर्ग को बाहर रखना सरकार के लिए व्यावहारिक नहीं था।

ड्राफ्ट में OBC का उल्लेख नहीं था, लेकिन समिति की सिफारिशों के बाद इसे शामिल किया गया। इससे एक ओर OBC छात्र संगठनों में संतोष दिखा, तो दूसरी ओर सामान्य वर्ग में असुरक्षा की भावना गहरी हुई।

सरकार ने संतुलन का दावा किया, पर आलोचकों का कहना है कि यह संतुलन नीति का नहीं, बल्कि वोट बैंक का है।

 

रोहित वेमुला और नीति का राजनीतिक प्रतीकीकरण

इन नियमों की पृष्ठभूमि 2016 की रोहित वेमुला प्रकरण से जोड़ी जाती है। एक दशक बाद भी इस घटना को नीति-निर्माण का नैतिक आधार बनाना यह संकेत देता है कि सुधार से अधिक प्रतीकात्मक राजनीति हावी है।

समर्थकों के अनुसार यह सामाजिक न्याय की निरंतरता है, जबकि आलोचकों के लिए यह हर संस्थागत समस्या को जातिगत चश्मे से देखने की प्रवृत्ति का उदाहरण है।

 

मूल समस्या: इक्विटी का दर्शन

इस पूरे विवाद का केंद्रीय बिंदु इक्विटी की अवधारणा है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हो रही है। आपत्ति इक्विटी कमेटी की संरचना पर की जा रही है, लेकिन शायद ही कोई यह पूछ रहा है कि “इक्विटी” स्वयं न्याय के किस सिद्धांत पर आधारित है।

न्याय का मूल सिद्धांत यह है कि अधिकार व्यक्तियों के होते हैं, समुदायों या समूहों के नहीं।

सवर्ण अधिकार, दलित अधिकार, अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक अधिकार जैसी संकल्पनाएँ न्यायशास्त्र की मूल आत्मा से मेल नहीं खातीं। यदि किसी व्यक्ति के साथ उसकी पहचान के कारण अन्याय होता है, तब भी वह अन्याय व्यक्ति के साथ ही होता है, न कि पूरे समुदाय के साथ।

इक्विटी का दर्शन असमानता को स्वतः भेदभाव मान लेता है और यह मानकर चलता है कि disparity का एकमात्र कारण discrimination है। परिणामस्वरूप यह यह जाँचने की आवश्यकता ही समाप्त कर देता है कि वास्तव में किस व्यक्ति के साथ अन्याय हुआ है या हुआ भी है या नहीं।

इस दृष्टिकोण में न्याय व्यक्ति-केन्द्रित न रहकर समूह-केन्द्रित हो जाता है। सामाजिक न्याय का सारा ताना-बाना इसी भ्रम के रेतीली जमीन पर खड़ी है।

 

सामान्य वर्ग की चिंता और झूठी शिकायतों का खतरा

सामान्य वर्ग की चिंता केवल प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है।

इक्विटी कमेटियों में आरक्षित वर्ग का बहुमत, 24 घंटे में कार्रवाई का दबाव और झूठी शिकायतों पर दंड के अभाव से यह आशंका पैदा होती है कि न्याय की प्रक्रिया स्वयं अन्याय का साधन बन सकती है।

न्याय अपराधी और पीड़ित की समूह पहचान तय करके नहीं दिया जा सकता।

यदि किसी व्यवहार को रोकना है तो उसे सार्वभौमिक रूप से अपराध घोषित करना होगा, न कि कुछ समूहों के लिए विशेष संरक्षण और दूसरों के लिए अनुमानित अपराधबोध खड़ा करके।

जो पूरे समूह के लिए विशेष संरक्षण माँगता है, वह न्याय नहीं बल्कि विशेषाधिकार की माँग कर रहा है।

और जो इस आधार पर अन्याय की शिकायत करता है कि उसका समूह संरक्षित नहीं रहा, वह भी विशेषाधिकार छूटने की शिकायत ही कर रहा है।

 

सुझाव: न्याय को व्यक्ति-केंद्रित बनाइए

विषय – वर्तमान स्थिति – आवश्यक सुधार

झूठी शिकायतें – कोई दंड नहीं – दंडात्मक प्रावधान स्पष्ट रूप से जोड़े जाएँ

समिति संरचना – समूह आधारित प्रतिनिधित्व – व्यक्ति-आधारित, संतुलित और तटस्थ संरचना

न्याय प्रक्रिया – समूह पहचान आधारित – अपराध और पीड़ित की व्यक्ति-आधारित जाँच

इक्विटी कार्यालय – निगरानी केंद्र – काउंसलिंग और समाधान केंद्र

 

यदि उद्देश्य वास्तव में भेदभाव रोकना है, तो अपमानजनक और दुर्व्यवहारपूर्ण आचरण को सभी के लिए समान रूप से अपराध घोषित किया जाना चाहिए।

 

निष्कर्ष: व्यवस्था का अन्याय समाज का दंड

व्यक्तिगत अन्याय एक व्यक्ति को प्रभावित करता है, लेकिन जब अन्यायपूर्ण व्यवस्था खड़ी की जाती है, तो उसका दंड पूरे समाज को भुगतना पड़ता है।

न्याय की प्रकृति ही ऐसी है कि जब व्यवस्था प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध होती है, तो उसका परिणाम केवल एक वर्ग तक सीमित नहीं रहता।

UGC के इक्विटी नियम यदि व्यक्ति-आधारित न्याय की ओर नहीं लौटे, तो वे समावेशिता के नाम पर नए विभाजन पैदा करेंगे।

सड़क कितनी भी चिकनी क्यों न हो, यदि दिशा गलत है, तो मंज़िल भी गलत ही होगी।

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