InstitutionalChhattisgarhNational News

राहुल गांधी: गांधी-नेहरू की विरासत या कम्युनिज्म की कठपुतली?

राहुल गांधी को लेकर आज भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि वे किस परिवार से आते हैं। यह तो सर्वविदित है। वे नेहरू-गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी हैं। प्रश्न यह है कि क्या वे उस विरासत के वैचारिक उत्तराधिकारी भी हैं?

मेरे विचार से उत्तर स्पष्ट है: नहीं।

राहुल गांधी आज नाम के गांधी हैं, लेकिन विचारों के स्तर पर वे गांधी-नेहरू की परंपरा से बहुत दूर जा चुके हैं। बल्कि उनकी राजनीति को देखकर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या वे कांग्रेस की ऐतिहासिक विचारधारा के नेता हैं या साम्यवादी वैचारिकी के राजनीतिक प्रवक्ता?

इसीलिए उन्हें “कम्युनिज्म का पपेट” कहना केवल राजनीतिक कटाक्ष नहीं, बल्कि उनकी राजनीति की दिशा पर गंभीर प्रश्न है।

विरासत चाहिए, लेकिन विचारों की नहीं?

राहुल गांधी को राजनीति में सबसे बड़ी पूंजी क्या मिली?

उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियां नहीं, बल्कि उनका परिवार।

नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम से बनी राजनीतिक विरासत ने राहुल गांधी को वह सार्वजनिक पहचान दी, जिसके लिए किसी सामान्य भारतीय राजनेता को दशकों तक संघर्ष करना पड़ता।

लेकिन आश्चर्य यह है कि राहुल गांधी अपनी उसी पारिवारिक विरासत के अनेक मूल विचारों से लगातार दूर होते दिखाई देते हैं।

यहां सवाल बहुत सीधा है:

यदि परिवार की विरासत इतनी महत्वपूर्ण है कि वह आपको राजनीतिक पहचान दे सकती है, तो फिर परिवार, परंपरा, उत्तरदायित्व और सामाजिक अनुशासन की विरासत इतनी अप्रासंगिक क्यों हो जाती है?

क्या विरासत केवल सत्ता और प्रतिष्ठा की होनी चाहिए?

क्या राजनीतिक विरासत स्वीकार्य है लेकिन सामाजिक विरासत नहीं?

नेहरू की विरासत और राहुल गांधी की आरक्षण राजनीति

इस विरोधाभास का एक शानदार उदाहरण आरक्षण की राजनीति है।

जवाहरलाल नेहरू को जाति-आधारित आरक्षण के विस्तार को लेकर गंभीर आपत्ति थी। 27 जून 1961 को मुख्यमंत्रियों को लिखे अपने पत्र में उन्होंने कहा कि सहायता आर्थिक आधार पर दी जानी चाहिए, जाति के आधार पर नहीं। उन्होंने विशेष रूप से सरकारी सेवाओं में आरक्षण के प्रति अपनी असहमति व्यक्त की और प्रशासन में दक्षता तथा मानकों के गिरने की चिंता जताई।

1962 में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में भी नेहरू ने जाति के आधार पर आरक्षण को प्रोत्साहित न करने की अपनी बात दोहराई।

अब राहुल गांधी को देखिए।

आज राहुल गांधी जाति जनगणना को अपनी राजनीति का प्रमुख मुद्दा बना चुके हैं और 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा को हटाने की घोषणा कर चुके हैं। कांग्रेस का आधिकारिक घोषणापत्र भी SC, ST और OBC के लिए आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा बढ़ाने हेतु संवैधानिक संशोधन का वादा करता है।

तो सवाल राहुल गांधी से है:

आप नेहरू के राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं या उनके विचारों के?

यदि नेहरू की विरासत का दावा है, तो क्या नेहरू के इन विचारों से भी आपका कोई संबंध है?

या फिर नेहरू का नाम केवल उतनी ही सीमा तक स्वीकार्य है, जहां वह राजनीतिक लाभ देता है?

आरक्षण सामाजिक न्याय है या स्थायी जातीय राजनीति?

आरक्षण का उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को अवसर देना था। इस उद्देश्य पर गंभीर बहस हो सकती है और होनी भी चाहिए।

लेकिन सवाल यह है कि क्या आरक्षण को लगातार विस्तार देते जाना ही सामाजिक न्याय का अंतिम लक्ष्य है?

यदि हर सामाजिक समस्या का उत्तर जातीय गणना, जातीय पहचान और आरक्षण का विस्तार बन जाए, तो क्या हम जाति को समाप्त कर रहे हैं या उसे राजनीतिक रूप से और अधिक स्थायी बना रहे हैं?

राहुल गांधी कहते हैं कि जाति जनगणना से सामाजिक न्याय मजबूत होगा।

लेकिन दूसरा प्रश्न भी तो पूछा जा सकता है:

यदि हम हर नागरिक को पहले उसकी जाति से पहचानेंगे, उसकी संख्या गिनेंगे, उसके राजनीतिक हिस्से का हिसाब लगाएंगे और फिर उसी आधार पर अवसर बांटेंगे, तो क्या हम जातिविहीन समाज की ओर जा रहे हैं या जाति को लोकतंत्र की स्थायी राजनीतिक मुद्रा बना रहे हैं?

यहीं राहुल गांधी की राजनीति पर गंभीर आपत्ति उत्पन्न होती है।

व्यक्ति नहीं, वर्ग और जाति

राहुल गांधी की राजनीति का एक पैटर्न दिखाई देता है।

कभी वर्ग।

कभी जाति।

कभी अमीर बनाम गरीब।

कभी वंचित बनाम विशेषाधिकार प्राप्त।

कभी कॉरपोरेट बनाम सामान्य नागरिक।

राजनीति में असमानता के प्रश्न उठाना गलत नहीं है। लेकिन जब राजनीति का समाधान लगातार समाज को अलग-अलग समूहों में बांटकर उनके बीच राजनीतिक संघर्ष पैदा करने में खोजा जाने लगे, तब वह गांधीवादी सामाजिक समन्वय से अलग दिशा हो जाती है।

यही वह जगह है जहां राहुल गांधी की राजनीति पर साम्यवादी प्रभाव का प्रश्न उठता है।

गांधी का नाम और वर्ग-संघर्ष की राजनीति

गांधी का रास्ता वर्ग-संघर्ष का रास्ता नहीं था।

गांधी का आग्रह था कि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संघर्ष के स्थान पर समन्वय स्थापित हो।

राहुल गांधी की वर्तमान राजनीति में इसके विपरीत संघर्ष की भाषा लगातार मजबूत होती दिखाई देती है।

यही कारण है कि प्रश्न उठता है:

राहुल गांधी गांधी के नाम के उत्तराधिकारी हैं या गांधी के विचारों के?

यदि नाम गांधी का है लेकिन राजनीति का बुनियादी ढांचा वर्गीय और जातीय संघर्ष पर खड़ा किया जा रहा है, तो फिर गांधी केवल उपनाम रह जाता है, विचार नहीं।

सबसे बड़ा विरोधाभास

राहुल गांधी जिस नेहरू-गांधी परिवार की विरासत के कारण भारतीय राजनीति में इतने महत्वपूर्ण हैं, उसी परिवार की राजनीतिक पूंजी का उपयोग करके वे उन विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं जो उस परिवार की मूल राजनीतिक धारा से कई मामलों में अलग दिखाई देते हैं।

अपने परिवार की राजनीतिक विरासत उन्हें स्वीकार है।

लेकिन परिवार की सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्न।

वंश की राजनीतिक पूंजी स्वीकार है।

लेकिन वंश, परंपरा और सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा पर आपत्ति।

नेहरू का नाम स्वीकार है।

लेकिन नेहरू के आरक्षण संबंधी विचार स्वीकार नहीं।

कांग्रेस का इतिहास स्वीकार है।

लेकिन कांग्रेस के पुराने वैचारिक संतुलन की जगह अधिकाधिक पहचान-आधारित राजनीति।

तो फिर यह कैसी विरासत है?

राहुल गांधी की समस्या यही है

राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी समस्या शायद यह है कि उन्हें अपनी राजनीतिक पहचान बनाने के लिए अपने परिवार की विरासत की जरूरत है, लेकिन अपनी राजनीतिक विचारधारा के लिए उन्हें उसी विरासत से बाहर निकलना पड़ता है।

इसलिए वे एक अजीब वैचारिक स्थिति में खड़े दिखाई देते हैं।

नाम गांधी का।
राजनीतिक पूंजी नेहरू-गांधी परिवार की।
लेकिन विचारों की दिशा लगातार वामपंथ की ओर।

इसीलिए मेरा प्रश्न है:

क्या राहुल गांधी वास्तव में गांधी-नेहरू की वैचारिक विरासत के वाहक हैं, या गांधी-नेहरू के नाम और विरासत का उपयोग करके साम्यवादी वैचारिकी के राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले एक “पपेट” बन चुके हैं?

और यदि यह आरोप गलत है तो राहुल गांधी को इसका उत्तर देना चाहिए।

उन्हें बताना चाहिए कि:

उनकी राजनीति में नेहरू कहां हैं?
इंदिरा गांधी कहां हैं?
गांधी का सामाजिक समन्वय कहां है?
और वह कांग्रेस कहां है जो कभी स्वयं को राष्ट्रव्यापी राजनीतिक आंदोलन मानती थी, केवल जातीय समूहों का जोड़ नहीं?

क्योंकि विरासत केवल नाम से नहीं चलती। विरासत विचारों से चलती है।

और यदि विचार बदल गए हैं, तो ईमानदार राजनीति यह स्वीकार करने का साहस भी मांगती है कि नाम भले वही हो, लेकिन रास्ता बदल चुका है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *