मनुस्मृति पर राहुल गांधी: बजरंग मुनि जी के सवालों के घेरे में परिवार और राजनीति
पुणे में राहुल गांधी ने मनुस्मृति को महिलाओं की स्वतंत्रता के विरोधी विचार का प्रतीक बताते हुए कहा कि महिला किसी की संपत्ति नहीं है और उसे अपनी पहचान स्वयं निर्धारित करने का अधिकार है। उन्होंने “मनुस्मृति मानसिकता” और पितृसत्ता को चुनौती देने का आह्वान भी किया।
राहुल गांधी को महिलाओं की स्वतंत्रता की बात कहने का पूरा अधिकार है, लेकिन बजरंग मुनि जी का प्रश्न इससे कहीं आगे जाता है। उनका आरोप है कि राहुल गांधी भारतीय परिवार व्यवस्था को व्यक्ति की स्वतंत्रता के रास्ते की बाधा मानने वाली विचारधारा के प्रतिनिधि बनते जा रहे हैं। उनके अनुसार भारतीय संस्कृति में व्यक्ति अकेली इकाई नहीं है। वह परिवार और समाज का सदस्य है। परिवार बंधन नहीं, बल्कि अधिकारों और कर्तव्यों के संतुलन की संस्था है।

बजरंग मुनि जी का दूसरा गंभीर आरोप राहुल गांधी की राजनीति को लेकर है। उनका मानना है कि राहुल गांधी कम्युनिस्टों, अंबेडकरवादी राजनीति और मुस्लिम राजनीतिक हितों के साथ खड़े होकर ऐसी राजनीति को बढ़ावा दे रहे हैं जो भारतीय बहुसंख्यक समाज की पारंपरिक संस्थाओं की आलोचना करती है। उनके शब्दों में यह “इस्लामिक तुष्टिकरण” की राजनीति का हिस्सा है। यह एक राजनीतिक आरोप है, जिस पर बहस हो सकती है, लेकिन इसे नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
राहुल गांधी के आलोचकों का कहना है कि यदि मनुस्मृति की कुछ धारणाओं पर प्रश्न उठाना प्रगतिशीलता है, तो भारतीय परिवार व्यवस्था के सकारात्मक पक्षों को भी उसी निष्पक्षता से देखना चाहिए। परिवार ने भारतीय समाज में केवल स्त्री को भूमिका नहीं दी, बल्कि उसकी सुरक्षा, बच्चों के पालन-पोषण और पीढ़ियों के बीच उत्तरदायित्व का ढांचा भी बनाया है।
देश में कई राजनीतिक और सार्वजनिक व्यक्तियों ने राहुल गांधी की टिप्पणी पर सवाल उठाए हैं। भाजपा नेताओं ने भी उनकी मनुस्मृति की व्याख्या को चुनौती दी है।
इसलिए असली प्रश्न मनुस्मृति बनाम राहुल गांधी नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी परिवार व्यवस्था को सुधारते हुए बचाएगा, या पश्चिमी व्यक्तिवाद और पहचान आधारित राजनीति के प्रभाव में उसे कमजोर करेगा?
बजरंग मुनि जी की चुनौती राहुल गांधी के सामने यही है: भारतीय परिवार व्यवस्था में सुधार का विकल्प प्रस्तुत कीजिए, उसके विघटन का नहीं।
