खुला पत्र: हर्ष मंदर जी के नाम
विषय: आपके लेख “अफ़ज़ल गुरु की फांसी: न्याय और दया की कसौटी” पर एक गंभीर आपत्ति
आदरणीय हर्ष मंदर जी,
आपका उपरोक्त लेख ध्यान से पढ़ने के बाद यह पत्र लिखना आवश्यक लगा। दरअसल आप ने प्रधानमंत्री मोदी के लाल किले से कुछ लोगों को दिमागी नक्सल कहने का विरोध किया था। इस पत्र से मेरा दावा है कि दिमागी नक्सल किसे कहते हैं आप समझ जाएंगे। यह पत्र इस आधार पर लिखा जा रहा है कि सार्वजनिक जीवन में लिखा गया कोई भी लेख — विशेषकर वह जो राज्य, मृत्युदंड और न्यायिक प्रक्रिया जैसे गंभीर विषयों से जुड़ा हो — इस कसौटी पर कसे जाने का हकदार है कि क्या उसने तथ्यों के साथ न्याय किया है। दुर्भाग्य से आपका लेख इस कसौटी पर कई जगह खरा नहीं उतरता।

1. लेख की वास्तुकला ही भ्रामक है
आपका लेख अफ़ज़ल गुरु के मामले से शुरू होकर धीरे-धीरे मृत्युदंड के विरुद्ध एक व्यापक नैतिक तर्क में बदल जाता है। यह अपने आप में कोई अपराध नहीं, लेकिन जिस तरह आप एक विशिष्ट, विवादास्पद और साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील मामले को चुनकर उसे अपने वैचारिक निष्कर्ष तक पहुँचने का माध्यम बनाते हैं, वह प्रश्न खड़ा करता है: क्या यह लेख अफ़ज़ल गुरु के मामले का निष्पक्ष पुनर्मूल्यांकन है, या मृत्युदंड-विरोध को स्थापित करने के लिए चुना गया एक सुविधाजनक केस-स्टडी? आपकी सामग्री-चयन स्वयं इस दूसरे विकल्प की ओर इशारा करती है।

2. दोषसिद्धि और प्रत्यक्ष हत्या के बीच जानबूझकर धुंधलापन
आप बार-बार दोहराते हैं कि अफ़ज़ल गुरु संसद पर हमला करने वाले पाँच हमलावरों में नहीं था और किसी की हत्या में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं था। यह तथ्यात्मक रूप से सही है, लेकिन आप इसे इस तरह प्रस्तुत करते हैं मानो यह दोषसिद्धि के विरुद्ध निर्णायक तर्क हो। आप स्वयं जानते हैं कि आपराधिक षड्यंत्र और प्रत्यक्ष हत्या भारतीय दंड संहिता में अलग-अलग अवधारणाएँ हैं, और सर्वोच्च न्यायालय ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला के आधार पर षड्यंत्र में भूमिका को सिद्ध माना था। इस कानूनी भेद को धुंधला रखना पाठक को गुमराह करना है।

3. “परिस्थितिजन्य साक्ष्य” शब्द का दुरुपयोग
आप यह उल्लेख करते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने साक्ष्यों को परिस्थितिजन्य माना — यह सच है — लेकिन आप इसे इस तरह प्रस्तुत करते हैं जैसे “परिस्थितिजन्य” का अर्थ स्वतः “संदिग्ध” या “कमजोर” हो। भारतीय न्यायशास्त्र में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूर्ण श्रृंखला पर दोषसिद्धि सर्वथा मान्य आधार है। एक सुप्रशिक्षित लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के नाते आप इस भेद से अनभिज्ञ नहीं हो सकते — फिर भी आपने इसे स्पष्ट नहीं किया।

4. “56 गवाहों से जिरह नहीं हुई” — एक तथ्यात्मक रूप से भ्रामक दावा
यह इस पत्र की सबसे गंभीर आपत्ति है। आपके लेख (और इस पर आधारित मानवाधिकार-वृत्त की सामग्री) में यह दावा किया गया है कि 80 गवाहों में से 56 से जिरह नहीं हुई। मूल न्यायिक रिकॉर्ड की जाँच से यह तस्वीर कहीं अधिक जटिल और आपके दावे के विपरीत निकलती है:
- दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार PW-21 से PW-80 तक अफ़ज़ल गुरु को स्वयं जिरह करने का अवसर दिया गया था।
- अफ़ज़ल ने स्वयं PW-20, PW-29 और PW-66 से जिरह की।
- अनेक गवाहों से सभी आरोपियों की ओर से common cross-examination हुई।
- जहाँ आवश्यक था, amicus curiae ने जिरह की।
“56 गवाहों से जिरह नहीं हुई” और “56 गवाहों से अभियुक्त की ओर से किसी ने जिरह नहीं की” — ये दो अलग-अलग दावे हैं, और आपका लेख इनके बीच के अंतर को मिटा देता है। यह कोई मामूली भूल नहीं, बल्कि पाठक के मन में एक ऐसी तस्वीर गढ़ने वाला दावा है जो रिकॉर्ड से मेल नहीं खाती।
5. सुप्रीम कोर्ट ने इस आरोप को सुना और अस्वीकार किया — आपने यह क्यों छिपाया?
यह इस पत्र का सबसे मूलभूत आक्षेप है। आपने अपने लेख में यह प्रभाव दिया कि अप्रभावी कानूनी प्रतिनिधित्व का मुद्दा उपेक्षित रह गया। तथ्य यह है कि यही तर्क सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष स्वयं अफ़ज़ल गुरु की ओर से रखा गया था, और न्यायालय ने इसे विस्तार से दर्ज करके अस्वीकार किया — यह कहते हुए कि विचारण न्यायाधीश ने प्रभावी विधिक सहायता देने का प्रयास किया था और नियुक्त वकील अनुभवहीन या अप्रभावी नहीं था। यह भी रिकॉर्ड में है कि 8 जुलाई 2002 को अफ़ज़ल ने स्वयं अपनी पसंद के वकील की माँग की थी, न्यायालय ने उनसे संपर्क भी किया, परंतु वे मुकदमा लेने को तैयार नहीं हुए।
एक लेख जो “अफ़ज़ल को प्रभावी कानूनी सहायता नहीं मिली” कहता है, परंतु यह नहीं बताता कि यही आरोप सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखा जा चुका था और अस्वीकृत हुआ था — वह पाठक के साथ अन्याय करता है। यह omission संयोगवश नहीं लगता।
6. “सामूहिक अंतरात्मा” की आलोचना जायज़, पर प्रस्तुति एकतरफा
“Collective conscience” की अवधारणा पर आपका प्रश्न — कि क्या न्याय साक्ष्य से तय हो या जनाक्रोश से — वैध और महत्वपूर्ण है। परंतु आप इसे इस तरह प्रस्तुत करते हैं मानो यही दोषसिद्धि का एकमात्र आधार था, जबकि यह मूलतः सजा की गंभीरता के संदर्भ में प्रयुक्त एक विचार था। इस भेद को स्पष्ट न करना पाठक को गुमराह करता है।
7. राष्ट्रपतियों की दया-निर्णय-प्रक्रिया का गलत चित्रण
आप लिखते हैं कि दो राष्ट्रपतियों ने दया याचिका पर मुहर लगाने से इनकार किया, मानो यह दोषसिद्धि पर संदेह का प्रमाण हो। अनुच्छेद 72 की क्षमादान-शक्ति न्यायिक दोषसिद्धि की पुनर्समीक्षा नहीं है। इस संवैधानिक भेद को धुंधला करना पाठक को यह भ्रम देता है कि राष्ट्रपतियों की झिझक स्वयं दोष के प्रति संदेह की स्वीकृति थी।
8. “अच्छा कैदी था” — एक तार्किक छलांग
आप लिखते हैं कि अफ़ज़ल जेल में अनुशासित था और उसका उग्रवाद से मोहभंग हो चुका था। यह दया-याचिका और सजा में छूट के संदर्भ में एक mitigating factor हो सकता है, परंतु आपके लेख में यह लगभग निर्दोषता के तर्क के करीब पहुँचा दिया जाता है — जो तार्किक रूप से नहीं ठहरता।
9. उम्रकैद बनाम मृत्युदंड की तुलना में अशुद्धि
आप यह तुलना करते हैं कि यदि गुरु लगभग तीन वर्ष और जेल में रहता तो उम्रकैद की अवधि पूरी कर लेता — यह भारतीय दंड व्यवस्था में उम्रकैद की प्रकृति (जो स्वतः निश्चित वर्षों बाद रिहाई की गारंटी नहीं देती) को गलत ढंग से प्रस्तुत करता है, जिससे पाठक को झूठी निश्चितता का आभास होता है।
10. पीड़ित पक्ष लगभग अनुपस्थित है
न्याय की नैतिकता में कम-से-कम तीन पक्ष होते हैं — अपराधी, पीड़ित और समाज। आपकी संवेदना लगभग पूरी तरह अपराधी और उसके एक विशेष वैचारिक समर्थक-वर्ग के बीच केंद्रित है। संसद हमले में मारे गए सुरक्षाकर्मियों और उनके परिवारों की न्याय संबंधी अपेक्षा आपके लेख में लगभग अदृश्य है। यह असंतुलन आकस्मिक नहीं लगता।
11. स्रोत-चयन में स्पष्ट confirmation bias
आपके लेख में उद्धृत लगभग सभी आवाज़ें — नंदिता हक्सर, कॉलिन गोंज़ाल्वेस, अरुंधति रॉय, Amnesty International — एक ही वैचारिक दिशा से आती हैं। किसी भी ऐसे न्यायविद के तर्क को आपने विस्तार से जगह नहीं दी जो यह कहता हो कि निचली अदालत की प्रक्रियागत कमियों के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय का निष्कर्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की दृष्टि से न्यायसंगत था। एक “आलोचनात्मक” लेख से यह अपेक्षा उचित है कि वह विरोधी पक्ष का सबसे सशक्त तर्क भी सामने रखे — आपने यह नहीं किया।
12. जो सही है, उसे स्वीकार करना भी आवश्यक है
यह पत्र आपकी संपूर्ण मंशा को खारिज नहीं करता। फांसी की प्रक्रिया — परिवार को समय पर सूचना न मिलना, अंतिम मुलाकात न होना, शव न सौंपा जाना — पर आपकी आलोचना वास्तविक और गंभीर है। स्वयं पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी इस दिशा में लिखा है, और संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रक्रिया तंत्र ने भी due-process संबंधी चिंताएँ दर्ज की हैं। यह हिस्सा आपके लेख का सबसे मजबूत और सबसे ईमानदार पक्ष है। परंतु प्रक्रिया की आलोचना और दोषसिद्धि पर संदेह — ये दो अलग दावे हैं, और आपका लेख इन्हें बार-बार आपस में घुला देता है।
निष्कर्ष
“अफ़ज़ल गुरु को फांसी नहीं होनी चाहिए थी” और “अफ़ज़ल गुरु निर्दोष था” — ये दो बिल्कुल भिन्न दावे हैं। आपका लेख स्पष्टतः केवल पहला दावा स्थापित करने का प्रयास करता है, परंतु इसकी प्रस्तुति — चुनिंदा तथ्य, अधूरे संदर्भ, तथ्यात्मक रूप से संदिग्ध आँकड़े, और एकतरफा स्रोत-चयन — पाठक को व्यवस्थित रूप से दूसरे, कहीं अधिक गंभीर निष्कर्ष की ओर धकेलती है।
एक लेखक और सामाजिक विचारक के रूप में आपकी सद्भावना पर संदेह किए बिना भी, यह कहना आवश्यक है: जब विषय मृत्युदंड और राज्य की शक्ति जैसा गंभीर हो, तब तथ्यों के साथ यह स्वतंत्रता लेना — चाहे वह किसी भी नैतिक उद्देश्य के नाम पर हो — पाठकों और स्वयं न्याय की अवधारणा दोनों के साथ अन्याय है।
सादर,
एक चिंतित पाठक
यह पत्र सार्वजनिक न्यायिक अभिलेखों (सर्वोच्च न्यायालय, 4 अगस्त 2005 तथा दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसलों) की जाँच पर आधारित है।
