पथरीली राहें और मोरन-इरिया नदी का उफान भी नहीं डिगा सका हौसला; धौरपुर स्कूल की दो शिक्षिकाओं की कर्तव्यनिष्ठा की कलेक्टर ने की सराहना
बलरामपुर। जंगलों और दुरूह पहाड़ियों से घिरे बलरामपुर जिले में मानसून की दस्तक जहां प्राकृतिक खूबसूरती बढ़ा देती है, वहीं सुदूर अंचलों में जीवन की परीक्षा भी शुरू हो जाती है। तेज बारिश में उफनते नदी-नाले जब रास्ते रोक देते हैं, तब भी कर्तव्य और निष्ठा का सफर नहीं थमता। शिक्षा के प्रति ऐसे ही अदम्य समर्पण की मिसाल पेश कर रही हैं वाड्रफनगर विकासखंड के आश्रित ग्राम धौरपुर प्राथमिक शाला में पदस्थ दो महिला शिक्षिकाएं, जो महज 9 नौनिहालों के भविष्य को गढ़ने के लिए हर रोज उफनती नदियों को चुनौती दे रही हैं।

10-15 परिवारों की बस्ती, 9 छात्र और दो गुरुजन
ग्राम पंचायत मढ़ना के आश्रित टोले धौरपुर में लगभग 10 से 15 परिवार निवासरत हैं। स्थानीय स्तर पर बुनियादी शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए वर्ष 2005 में स्थापित इस प्राथमिक स्कूल में वर्तमान में केवल 9 बच्चे अध्ययनरत हैं। इन मासूमों को ककहरा सिखाने का जिम्मा दो महिला शिक्षिकाओं के कंधों पर है।
3 किमी पथरीला रास्ता और दो नदियों का जोखिम
स्कूल तक पहुंचने की डगर बरसात में जोखिम भरी हो जाती है। शिक्षिकाओं को पहले लगभग तीन किलोमीटर का बीहड़, पथरीला और दुर्गम पहाड़ी रास्ता पैदल नापना पड़ता है। इसके बाद रास्ते में पड़ने वाली मोरन और इरिया नदी के तेज बहाव को पार करना पड़ता है। पानी का स्तर कम होने पर किसी तरह संभलकर निकलना पड़ता है, लेकिन तेज बारिश में बहाव बढ़ते ही हर कदम जान जोखिम में डालने जैसा होता है।
एक हाथ में 9 माह की दुधमुंही बच्ची, दूसरे से नदी का उफान पार
इस पूरे सफर में सबसे मार्मिक और साहसी पहलू शिक्षिका कर्मिला टोप्पो का है। उनकी एक 9 माह की दुधमुंही बच्ची है, जिसे घर पर अकेले नहीं छोड़ा जा सकता। ऐसे में कर्मिला अपनी मासूम बेटी को गोद में थामे, एक हाथ से उसे संभालते हुए और दूसरे से संतुलन बनाते हुए उफनती नदी की धारा को पार करती हैं। वर्ष 2014 से इसी विद्यालय में सेवा दे रहीं कर्मिला टोप्पो का कहना है कि हर साल बरसात में मुश्किलें जरूर पेश आती हैं, मगर नौनिहालों की पढ़ाई बाधित न हो, यही सोच उन्हें आगे बढ़ने की हिम्मत देती है।
कलेक्टर ने सराहा अनुकरणीय समर्पण
दुर्गम रास्तों और विपरीत मौसम के बावजूद बच्चों के भविष्य के प्रति दोनों महिला शिक्षिकाओं की यह निष्ठा प्रशासन के संज्ञान में भी आई है। बलरामपुर कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी ने शिक्षिकाओं के इस असाधारण जज्बे और कर्तव्यपरायणता की मुक्तकंठ से सराहना की है।
धौरपुर की यह तस्वीर केवल एक स्कूल पहुंचने की जद्दोजहद भर नहीं है, बल्कि यह सुदूर वनांचलों में ज्ञान की लौ जलाए रखने वाले शिक्षकों के उस मूक त्याग का प्रमाण है, जहां नदी का उफान भी बच्चों के सपनों की राह नहीं रोक पाता।
