आजादी से 13 साल पहले महाराजा रामानुज शरण सिंहदेव ने कराई थी स्थापना, आज भी सीना ताने खड़ा है 1934 में बना ऐतिहासिक भवन
रामानुजगंज (बलरामपुर)। कन्हर नदी का विहंगम तट, मां महामाया और श्रीराम के ऐतिहासिक मंदिर तथा सीमावर्ती व्यापारिक केंद्र के रूप में पहचानी जाने वाली रामानुजगंज की धरती अपने गर्भ में समृद्ध ऐतिहासिक विरासत समेटे हुए है। वर्तमान चकाचौंध के बीच शहर की गलियों में कई ऐसी मूक धरोहरें आज भी मौजूद हैं, जो इसके उद्भव और सरगुजा रियासत काल की वैभवशाली गाथा बयां करती हैं। इन्हीं में से एक नायाब मिसाल है थाना रोड स्थित वर्ष 1934 में निर्मित पुराना अस्पताल भवन। करीब 92 बसंत देख चुकी यह इमारत निर्माण तकनीक की मजबूती का अद्भुत प्रमाण है, हालांकि देखरेख और संरक्षण के अभाव में अब इसके कई हिस्से जीर्णोद्धार की बाट जोह रहे हैं।

‘बोहला’ से ‘रामानुजगंज’ तक का सफर और स्वास्थ्य की नींव
इतिहास के पन्नों को पलटें तो रामानुजगंज को आधुनिक स्वरूप में बसाने का श्रेय तत्कालीन सरगुजा स्टेट के महाराजा रामानुज शरण सिंहदेव को जाता है। कभी ‘बोहला’ नाम से विख्यात इस क्षेत्र में महाराजा ने दूरदराज से लाकर लोगों को बसाया, व्यापारिक हाट-बाजार विकसित किया और आगे चलकर उन्हीं के नाम पर यह शहर ‘रामानुजगंज’ कहलाया। देश की आजादी से लगभग 13 वर्ष पूर्व यानी 1934 में महाराजा ने सुदूर वनांचल की जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की दूरदर्शिता के साथ इस भव्य अस्पताल का निर्माण कराया था।

रियासतकालीन वास्तुकला: स्टेट इंजीनियर का डिजाइन, हीरालाल एंड ब्रदर्स का निर्माण
इस ऐतिहासिक इमारत का प्राविधिक नक्शा व डिजाइन सरगुजा स्टेट के तत्कालीन स्टेट इंजीनियर पंडित चंद्र शेखर शर्मा (सीई) ने तैयार किया था। वहीं इसके निर्माण का दायित्व सरगुजा रियासत के प्रतिष्ठित स्टेट कॉन्ट्रैक्टर फर्म ‘मैसर्स हीरालाल एंड ब्रदर्स, इंजीनियर, बिल्डर्स’ को सौंपा गया था। 92 साल के लंबे कालखंड के बावजूद भवन आज भी अपने मूल स्थापत्य स्वरूप में सीना ताने खड़ा है। वर्तमान में इस ऐतिहासिक परिसर में किशोर न्यायालय का संचालन किया जा रहा है।
छत से टपकता पानी दे रहा जीर्णोद्धार का संकेत
जहां आज के दौर की कंक्रीट की इमारतें कुछ ही वर्षों में दरकने लगती हैं, वहीं नौ दशक पूर्व पत्थरों और चूने-गारे से तैयार यह ढांचा आज भी बेहद मजबूत है। लेकिन समय की मार और नियमित रखरखाव न होने से बारिश के दिनों में छत के कई हिस्सों से पानी का रिसाव होने लगा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि प्रशासन समय रहते इसके संरक्षण और जीर्णोद्धार पर ध्यान दे, तो यह धरोहर आगामी कई दशकों तक प्रशासनिक व सार्वजनिक उपयोग में बनी रह सकती है।

स्मृतियों में दर्ज सुनहरे दिन: वरिष्ठ नागरिकों की जुबानी
नगर के वयोवृद्ध नागरिक सुभाष जायसवाल याद करते हुए बताते हैं कि जिस दौर में समूचे अंचल में प्राथमिक सुविधाओं का नितांत अभाव था, तब महाराजा रामानुज शरण सिंहदेव ने यहां पूर्णकालिक अस्पताल की स्थापना कराई थी। उस समय योग्य और अनुभवी चिकित्सक यहां सेवाएं देते थे तथा मरीजों के लिए इनडोर वार्ड की उत्तम व्यवस्था थी। उस दौर में रियासत के भीतर ऐसा सर्वसुविधायुक्त अस्पताल होना अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि थी।
वे आगे बताते हैं कि इस अस्पताल के ठीक सामने महारानी बृजेश्वरी हाई स्कूल संचालित होता था, जहां उन्होंने स्वयं प्राथमिक से लेकर मैट्रिक तक की शिक्षा ग्रहण की। उस दौर में थाना, अस्पताल और स्कूल की ये तीन इमारतें ही रामानुजगंज की प्रमुख पहचान हुआ करती थीं। कालचक्र के साथ पुराना स्कूल भवन तो नए रूप में ढल गया, किंतु अस्पताल की मूल इमारत अतीत की गवाह बनकर आज भी कायम है।
आस्था और निर्माण से जुड़ी अनकही गाथाएं
महाराजा रामानुज शरण सिंहदेव की गहरी धार्मिक निष्ठा का ही परिणाम था कि उन्होंने अस्पताल के साथ-साथ कन्हर तट पर मां महामाया मंदिर और राम मंदिर की प्रतिष्ठा कराई, जो आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र हैं।
वहीं, भवन का निर्माण कराने वाले चौधरी परिवार की गाथा भी रियासत के गौरव से जुड़ी है। चौधरी हीरालाल के छोटे भाई के पौत्र दिनेश गुप्ता बताते हैं कि उनके दादाजी की फर्म ‘हीरालाल एंड ब्रदर्स’ ने ही पुराने अस्पताल के साथ-साथ वर्ष 1934 के आसपास ही रामानुजगंज के पुराने थाने का भी निर्माण कराया था। यह परिवार रियासत के प्रशासनिक ढांचे का भी अभिन्न अंग था—चार भाइयों में सबसे बड़े चौधरी हीरालाल स्टेट कॉन्ट्रैक्टर थे, दूसरे चौधरी जवाहरलाल, तीसरे मोतीलाल स्टेट के खजांची और सबसे छोटे चौधरी मोहरलाल सरगुजा स्टेट के तहसीलदार के पद पर आसीन थे।
विरासत को सहेजने की दरकार
स्थानीय प्रबुद्धजनों और नागरिकों की मांग है कि जिला प्रशासन इस भवन को महज एक सामान्य ईंट-गारे का ढांचा न मानकर रामानुजगंज के उद्भव और रियासतकालीन इतिहास से जुड़ी एक ‘हेरिटेज साइट’ (विरासत) के रूप में संरक्षित करे, ताकि आने वाली पीढ़ियां नगर की गौरवमयी जड़ों और समृद्ध वास्तुकला से रूबरू हो सकें।
