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बंगाल की माटी, रामानुजगंज की भक्ति: 5 दशकों से अनवरत जारी है सूत्रधार परिवार की मूर्तिकला की अनूठी परंपरा

रामानुजगंज (बलरामपुर)। शारदीय नवरात्र की आहट के साथ ही बलरामपुर जिले के सीमावर्ती नगर रामानुजगंज में उत्सव का माहौल बनने लगा है। पूजा पंडालों की तैयारियों के बीच मां दुर्गा की मनोहारी प्रतिमाएं आकार ले रही हैं। इन जीवंत प्रतिमाओं के निर्माण के पीछे केवल मिट्टी और रंगों का मेल नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले से आए एक मूर्तिकार परिवार की पांच दशक पुरानी साधना, परंपरा और आत्मीय रिश्ता जुड़ा हुआ है। आधी सदी से यह परिवार हर साल नवरात्र से ठीक एक माह पूर्व रामानुजगंज पहुंचता है और अपनी पारंपरिक शिल्पकला से मां भगवती के रूपों को गढ़ता है।

पिता काशीनाथ ने पीपल चौक से शुरू की थी परंपरा

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया निवासी 64 वर्षीय वरिष्ठ मूर्तिकार दुर्गा दास सूत्रधार बताते हैं कि रामानुजगंज में प्रतिमा निर्माण का यह सिलसिला उनके पूज्य पिता स्वर्गीय काशीनाथ सूत्रधार ने करीब पचास वर्ष पूर्व शुरू किया था। उस दौर में रामानुजगंज के मध्य बाजार स्थित पीपल चौक के समीप केवल एक ही स्थान पर सार्वजनिक रूप से मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती थी और उनके पिता विशेष रूप से बंगाल से आकर यहां मूर्ति तैयार करते थे।

15 वर्ष की आयु में थामा औजार, आज बन चुकी है पहचान

दुर्गा दास याद करते हैं कि जब वे महज 15 वर्ष के थे, तब पहली बार पिता की उंगली पकड़कर रामानुजगंज आए थे। पिता के सानिध्य में रहकर उन्होंने मिट्टी गूंथने, ढांचा तैयार करने और बारीकियों को तराशने का हुनर सीखा। समय के साथ यह कला उनकी आजीविका के साथ-साथ जीवन की सबसे बड़ी पहचान बन गई। आज करीब 50 साल बीत जाने के बाद भी उनका यह वार्षिक प्रवास बिना किसी रुकावट के अनवरत जारी है।

नवरात्र से एक माह पहले डेरा, दिन-रात की कड़ी मेहनत

दुर्गा दास सूत्रधार ने बताया कि हर वर्ष शारदीय नवरात्र प्रारंभ होने से लगभग एक महीने पहले वे अपने परिजनों और कुशल कारीगरों के साथ रामानुजगंज में डेरा डाल लेते हैं। इस वर्ष भी नगर के दो से तीन प्रमुख सार्वजनिक पूजा पंडालों के लिए भव्य प्रतिमाओं के निर्माण का दायित्व उनके पास है। मिट्टी के चयन, पुआल और बांस से ढांचा खड़ा करने, माटी का लेप चढ़ाने से लेकर अंतिम रूप में चटक रंगों और आभूषणों से शृंगार करने तक का काम बेहद धैर्य और समयबद्ध होता है। उनके साथ दो-तीन अन्य सहयोगी कारीगर भी लगातार जुटे हुए हैं ताकि पंचमी-षष्ठी तक सभी प्रतिमाएं पूर्ण रूप से सज-धजकर तैयार हो सकें।

विरासत को आगे बढ़ा रही तीसरी पीढ़ी: बेटे सुमन ने संभाला जिम्मा

पारिवारिक शिल्पकला की यह अनमोल विरासत अब तीसरी पीढ़ी के हाथों में सुरक्षित है। दुर्गा दास के छोटे बेटे सुमन सूत्रधार भी इस परंपरा को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ा रहे हैं। सुमन बताते हैं कि वे पिछले लगभग दस वर्षों से मूर्तिकला के क्षेत्र में सक्रिय हैं और पिता के साथ हर साल रामानुजगंज आ रहे हैं। उन्होंने मूर्तियों में विशेष मिट्टी का लेप चढ़ाने, फिनिशिंग देने और रंगों के संयोजन में महारत हासिल कर ली है और अब वे पिता के कंधे से कंधा मिलाकर प्रतिमा निर्माण के मुख्य चरणों को संभाल रहे हैं।

बंगाल की शिल्पकला और रामानुजगंज की लोक-आस्था का संगम

रामानुजगंज में पुरुलिया के सूत्रधार परिवार का आगमन अब स्थानीय नवरात्र उत्सव की एक अभिन्न पहचान बन चुका है। एक तरफ जहां स्थानीय पूजा कमेटियां पंडाल और रोशनी की व्यवस्था में जुटती हैं, वहीं दूसरी तरफ यह परिवार अपनी पुश्तैनी कला के जरिए मिट्टी में प्राण फूंकने का काम करता है। सीमाओं से परे बंगाल की समृद्ध मूर्तिशिल्प और रामानुजगंज की अगाध धार्मिक आस्था का यह संगम न केवल सांस्कृतिक सेतु का काम कर रहा है, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे अपनत्व और विश्वास की जीवंत मिसाल भी है।

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