कन्हर तट पर विराजे ‘जलकेश्वर नाथ’: जहाँ बारिश में चार महीने स्वयं नदियाँ करती हैं महादेव का जलाभिषेक
बलरामपुर। सावन का पवित्र महीना आते ही समूचा अंचल भगवान भोलेनाथ की भक्ति में लीन हो चुका है। तड़के से ही शिवालयों में श्रद्धालुओं का तांता लग रहा है, पर बलरामपुर ज़िले में एक ऐसा धाम भी है जो अपनी विलक्षण भौगोलिक बनावट और अटूट आस्था के कारण हर किसी के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

रामानुजगंज से महज़ दो किलोमीटर दूर, ग्राम पंचायत लुर्गी में कन्हर नदी के पावन तट पर स्थित है—जलकेश्वर नाथ शिव मंदिर। इस धाम की सबसे अनोखी विशेषता यहाँ स्थापित दो शिवलिंग हैं। नदी के ठीक मुहाने पर नीचे स्थित पहला शिवालय मानसून की पहली बारिश के साथ ही उफनती कन्हर नदी की गोद में समा जाता है। जब तक नीचे का मंदिर जलमग्न रहता है, तब तक श्रद्धालु तट के ऊपरी हिस्से में बने दूसरे शिवालय में दर्शन-पूजन करते हैं।
जब नदियाँ स्वयं करती हैं जलाभिषेक स्थानीय जनमानस में कन्हर नदी को गंगा स्वरूपा माना जाता है। श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा है कि वर्षा ऋतु के चार महीनों में कन्हर रूपी गंगा स्वयं भगवान जलकेश्वर नाथ का निरंतर जलाभिषेक करती हैं। जैसे-जैसे बारिश थमती है और नदी का जलस्तर नीचे जाता है, डूबा हुआ शिवलिंग पुनः प्रकट होकर भक्तों को दर्शन देता है। प्रकृति, अध्यात्म और जन-आस्था का ऐसा सुंदर दृश्य अन्यत्र दुर्लभ है।

दो राज्यों की आस्था का संगम जलकेश्वर नाथ धाम की भौगोलिक स्थिति भी इसे विशेष बनाती है। कन्हर नदी के एक ओर छत्तीसगढ़ का रामानुजगंज अंचल है, तो दूसरी ओर झारखंड की सीमा। यही कारण है कि यहाँ केवल स्थानीय ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्य झारखंड से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं। विशेषकर महाशिवरात्रि के समय जब नदी शांत होती है, तब दोनों राज्यों के भक्त यहाँ पहुँचकर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
गंगा से जुड़ा है कन्हर का स्वरूप धार्मिक मान्यता के साथ-साथ इसका अनूठा भौगोलिक प्रवाह भी है। जशपुर के अंचल से निकलने वाली कन्हर नदी आगे चलकर सोन नदी में विलीन होती है और सोन का संगम मोक्षदायिनी गंगा में होता है। इसी प्रवाह तंत्र के कारण कन्हर को ‘उत्तरवाहिनी’ और गंगा तुल्य पवित्र मानकर पूजा जाता है।
स्थानीय निवासी रमेश कुमार और शिवभक्त मीणा कुमारी बताती हैं कि जलकेश्वर नाथ महादेव इस पूरे क्षेत्र के संरक्षक देव हैं। सावन हो या शिवरात्रि, अंचल के लोग यहाँ अपनी मनोकामनाएँ लेकर पहुँचते हैं। डूबे हुए शिवालय की रहस्यमयी और अलौकिक छवि हर किसी को शिव-भक्ति के अनूठे रंग में सराबोर कर देती है।
