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श्रेष्ठतावाद का त्रिकोण: तमिल समाज में वर्चस्व की बदलती भाषा

— ज्ञानेन्द्र आर्य
किसी समाज को समझना हो तो यह देखना पड़ता है कि उसमें “श्रेष्ठ कौन है” — यह प्रश्न किस-किस रूप में और किसके द्वारा उठाया जाता रहा है। तमिल समाज के संदर्भ में यह प्रश्न विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ श्रेष्ठतावाद ने तीन अलग-अलग ऐतिहासिक रूप धारण किए हैं — और तीनों की आंतरिक संरचना आश्चर्यजनक रूप से एक-दूसरे से मिलती है।
पहला चरण: ब्राह्मण-विरोधी आख्यान का निर्माण


बीसवीं शताब्दी के आरंभ में तमिल समाज में यह प्रचार किया गया कि शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक अवसरों पर ब्राह्मणों का एकाधिकार है और शेष समाज को उससे व्यवस्थागत रूप से वंचित किया गया है।
किंतु इतिहास के तथ्य इस आख्यान से मेल नहीं खाते।
1822-25 का मुनरो सर्वेक्षण — जो ब्रिटिश अधिकारी सर थॉमस मुनरो के निर्देशन में मद्रास प्रेसीडेंसी में किया गया था — एक महत्त्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करता है। इस सर्वेक्षण में पाया गया कि पारंपरिक शिक्षण संस्थाओं में 65 से 70 प्रतिशत तक छात्र उन समुदायों से थे जिन्हें आज दलित और पिछड़ा वर्ग कहा जाता है। अर्थात् पारंपरिक भारतीय शिक्षा व्यवस्था उतनी “बंद” और “ब्राह्मण-केंद्रित” नहीं थी जितनी बताई गई।
हाँ, उच्च शिक्षा के स्तर पर — विशेषकर स्नातक स्तर पर — ब्राह्मण छात्रों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक थी। किंतु इसकी व्याख्या संस्थागत बहिष्करण से नहीं, बल्कि एक भिन्न सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता से होती है। अन्य जातियों के पास परंपरागत व्यावसायिक ज्ञान था — कृषि, शिल्प, वाणिज्य, नाविकी, आयुर्वेद — जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता था और जिसके लिए औपचारिक विश्वविद्यालयी शिक्षा की आवश्यकता नहीं थी। वे शिक्षा-संस्थानों से दूर थे, बहिष्कृत नहीं।
इस जटिल ऐतिहासिक वास्तविकता को सरल बना दिया गया। “ब्राह्मण अधिक पढ़े-लिखे हैं” — इस तथ्य की व्याख्या “ब्राह्मणों ने बाकियों को पढ़ने नहीं दिया” के रूप में की गई। यह एक निर्मित आख्यान था — और इसी आख्यान को द्रविड़ आंदोलन की वैचारिक नींव बनाया गया।
दूसरा चरण: द्रविड़ श्रेष्ठतावाद
पेरियार और बाद में अन्नादुरई के नेतृत्व में जो आंदोलन खड़ा हुआ, उसने उसी निर्मित अन्याय को अपना आधार बनाया। “ब्राह्मण = आर्य = बाहरी आक्रमणकारी” और “द्रविड़ = मूल निवासी = पीड़ित” — यह द्विभाजन ऐतिहासिक रूप से विवादास्पद था, किंतु राजनीतिक रूप से अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हुआ।
इस आंदोलन में सामाजिक न्याय की कुछ वैध माँगें भी थीं। किंतु उसकी मूल संरचना प्रतिस्थापन की थी, परिवर्तन की नहीं। एक समुदाय को “श्रेष्ठ” से हटाकर दूसरे को “श्रेष्ठ” स्थापित करना — यह न्याय नहीं, वर्चस्व का स्थानांतरण है। “आर्य” और “ब्राह्मण” को सांस्कृतिक शत्रु घोषित करना, हिंदू परंपराओं और संस्कृत ज्ञान को “दमन का उपकरण” बताना — यह एक नई श्रेष्ठता का उद्घोष था, न्याय की स्थापना नहीं।
तीसरा चरण: भाषा और क्षेत्र का श्रेष्ठतावाद — स्टालिन युग
आज द्रमुक सरकार के नेतृत्व में यह आंदोलन अपने तीसरे रूप में है। अब तमिल भाषा, तमिल भूमि और तमिल पहचान को एक ऐसी सर्वोच्चता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जो केंद्र सरकार की नीतियों, हिंदी भाषा और उत्तर भारत की संस्कृति को “बाहरी षड्यंत्र” के रूप में देखती है।
स्टालिन सरकार के अनेक मंत्रियों ने सार्वजनिक मंचों पर बार-बार ऐसी भाषा का प्रयोग किया है जो तमिलनाडु में रहने वाले अन्य भाषाओं के नागरिकों को “अतिथि” अथवा “बाहरी” की श्रेणी में रखती है। हिंदी-भाषी नागरिकों के प्रति अवमानजनक वक्तव्य, केंद्र की हर नीति को “तमिल-विरोधी” रंग देना, और क्षेत्रीय पहचान को राष्ट्रीय एकता से ऊपर रखना — यह भाषायी और भौगोलिक श्रेष्ठतावाद है।
इसकी संरचना पर ध्यान दीजिए। पहले कहा जाता था — “मैं श्रेष्ठ हूँ क्योंकि मैं ब्राह्मण हूँ।” फिर कहा गया — “मैं श्रेष्ठ हूँ क्योंकि मैं द्रविड़ हूँ।” अब कहा जाता है — “मैं श्रेष्ठ हूँ क्योंकि मैं तमिल हूँ।” तीनों वाक्यों में केवल विशेषण बदला है — श्रेष्ठता का तर्क वही है।
निर्मित अन्याय और वास्तविक न्याय
यहाँ एक मूलभूत प्रश्न उठता है — यदि ब्राह्मण वर्चस्व का वह आख्यान ही ऐतिहासिक रूप से संदिग्ध था, तो जो आंदोलन उस आख्यान पर खड़ा हुआ, उसकी नैतिक वैधता क्या थी?
उत्तर यह है कि वास्तविक सामाजिक असमानताएँ थीं — किंतु उनके कारण, स्वरूप और समाधान वे नहीं थे जो बताए गए। परंपरागत ज्ञान-व्यवस्था को “दमन” कहकर नष्ट किया गया। जातिगत व्यावसायिक ज्ञान को “पिछड़ापन” घोषित कर औपनिवेशिक शिक्षा को “प्रगति” बताया गया। और इस पूरी प्रक्रिया में ब्राह्मण समुदाय को सामूहिक अपराधी के रूप में स्थापित किया गया — जो न्याय नहीं, एक नई अन्यायपूर्ण सरलीकरण था।

उपसंहार
तमिल समाज ने जो यात्रा की है वह केवल उस समाज की नहीं, सम्पूर्ण भारत के लिए एक गंभीर चेतावनी है। जब इतिहास को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया जाता है, जब एक समुदाय को “स्वाभाविक अपराधी” और दूसरे को “स्वाभाविक पीड़ित” घोषित किया जाता है — तो उससे जो आंदोलन उठता है वह न्याय की नहीं, प्रतिशोध की भाषा बोलता है।
पेरियार को अपना वैचारिक आदर्श मानने वाला और द्रविड़ आंदोलन की कोख से जन्मा डीएमके — और उसका वर्तमान स्टालिन युग — उसी झूठ की विरासत को आगे बढ़ा रहा है जिस पर यह आंदोलन खड़ा हुआ था। जो द्रविड़ आंदोलन एक निर्मित ऐतिहासिक झूठ पर खड़ा हुआ, वही आज तमिल श्रेष्ठतावाद का नया पाखंड रचकर पूरे देश को भाषा, क्षेत्र और पहचान के नाम पर भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करने का उपकरण बन चुका है।
किंतु इस राजनीति का सबसे बड़ा अंतर्विरोध यह है कि जो स्टालिन परिवार और उनके सहयोगी हिंदू सामाजिक सभ्यता से आने वाले ब्राह्मणों और उत्तर भारत के नागरिकों के विरुद्ध निरंतर विष वमन करते हैं — वही परिवार ईसाई धर्म के प्रमुखों और चर्च की सत्ता के समक्ष नतमस्तक होने में कोई संकोच नहीं करता। एक ओर “तमिल स्वाभिमान” का उद्घोष, दूसरी ओर विदेशी मूल की संस्थाओं के सामने घुटने टेकने की विनम्रता — यह दोहरापन किसी भी विवेकशील व्यक्ति से छिपा नहीं है।
तथाकथित श्रेष्ठता का विरोध करते-करते स्वयं उसी श्रेष्ठता के अहंकार में डूब चुकी तमिलनाडु की राजनीति आज एक खतरनाक मोड़ पर खड़ी है। जो राजनीति न्याय की भाषा में चली थी, वह आज विभाजन का शस्त्र बन चुकी है। और यह शस्त्र यदि इसी प्रकार चलता रहा — तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यह राजनीति भारत की एकता और सामाजिक सौहार्द को किस दिशा में ले जाएगी।
सच्चा स्वाभिमान वह है जो किसी दूसरे के अपमान की माँग न करे। और सच्चा न्याय वह है जो इतिहास के साथ ईमानदार हो — और अपने अंतर्विरोधों से भी।

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