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पसमांदा मुस्लिम आरक्षण: “यह कोर्ट का नहीं, सरकार का काम है” – सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए उठाए अहम सवाल

नई दिल्ली | ​सुप्रीम कोर्ट ने पसमांदा मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की सूची में शामिल करने और उन्हें आरक्षण का लाभ देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि आरक्षण की सूची में किसी नई जाति या समुदाय को जोड़ना पूरी तरह से एक नीतिगत मामला है, जो विधायिका और सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।
​”क्या हम कानून बनाएं?” – CJI के कड़े सवाल
​सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने पसमांदा मुसलमानों के लिए विशेष आरक्षण की मांग की, तो CJI सूर्यकांत ने पूछा, “आप हमसे कानून बनाने के लिए कह रहे हैं? क्या न्यायपालिका यह तय कर सकती है कि किसी धर्म के भीतर कौन सा वर्ग पिछड़ा है और कौन सा नहीं?” अदालत ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या वे अन्य गरीब मुस्लिम समुदायों की कीमत पर केवल एक विशेष वर्ग को बढ़ावा देना चाहते हैं? कोर्ट ने समुदाय के पिछड़ेपन को साबित करने के लिए ठोस और प्रमाणित डेटा (Quantifiable Data) की कमी पर भी सवाल उठाए।
​अदालत के फैसले के मुख्य बिंदु:
​नीतिगत निर्णय: कोर्ट ने कहा कि किसी समुदाय को आरक्षण सूची में शामिल करने के लिए विस्तृत सर्वेक्षण और सामाजिक-आर्थिक अध्ययन की जरूरत होती है, जो सरकार का काम है।
​पिछड़ेपन का आधार: OBC का दर्जा केवल जाति या धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक कारकों के संतुलन पर तय होता है।
​संविधान का अनुच्छेद 32: बेंच ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका में ऐसे जटिल नीतिगत फैसले नहीं लिए जा सकते।
​पसमांदा समुदाय की मांग
​पसमांदा मुस्लिम (अजलाफ और अरजाल) समुदाय लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि वे मुस्लिम समाज के सबसे पिछड़े वर्ग हैं और उन्हें मुख्यधारा के आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है। याचिका में रंगनाथ मिश्रा आयोग और सच्चर कमेटी की रिपोर्टों का हवाला देते हुए 10% आरक्षण की मांग की गई थी।

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