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ईरान में अहिंसक लोकतंत्र: संकट, शक्ति-संतुलन और वैश्विक राजनीति

संपादकीय – ज्ञानेन्द्र आर्य

ईरान संकट, अमेरिका की सीमाएँ, भारत की तटस्थ कूटनीति और लोकतांत्रिक भविष्य पर ज्ञानेंद्र आर्य का विश्लेषणात्मक संपादकीय। 🌍📰

ईरान आज केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष का विषय नहीं है, बल्कि वह उस व्यापक संकट का प्रतीक बन चुका है जिसमें सत्ता, वैधता और जनता की आकांक्षाएँ आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव, परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव और आंतरिक असंतोष ने ईरान को उस स्थिति में ला खड़ा किया है जहाँ शासन की प्रकृति पर ही मूलभूत प्रश्न उठने लगे हैं।

ईरान की वर्तमान व्यवस्था वेलायत-ए-फकीह की अवधारणा पर आधारित है, जिसमें अंतिम राजनीतिक अधिकार एक सर्वोच्च शिया धर्मगुरु के पास केंद्रित रहता है। चुनाव और संसद जैसी संस्थाएँ मौजूद अवश्य हैं, परन्तु सत्ता का वास्तविक केंद्र धार्मिक नेतृत्व और उसके सुरक्षा ढाँचे के भीतर ही सीमित रहता है। इस संरचना में जनता की संप्रभुता सीमित हो जाती है और लोकतांत्रिक व्यवस्था का वास्तविक अर्थ लगभग समाप्त हो जाता है।

लेकिन समस्या केवल वर्तमान शासन तक सीमित नहीं है। ईरान में सत्ता के विकल्प भी स्पष्ट और निर्विवाद नहीं हैं। तीन प्रमुख राजनीतिक धाराएँ—NCRI, रज़ा पहलवी का राजशाही समर्थक गुट, और IRGC के प्रभाव में चल रही धार्मिक सत्ता—आपसी अविश्वास और टकराव में उलझी हुई हैं। यही टकराव ईरान की जनता को लंबे समय से अस्थिरता और अनिश्चितता के दौर में धकेलता रहा है।

NCRI (नेशनल काउंसिल ऑफ रेजिस्टेंस ऑफ ईरान) स्वयं को लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष शासन का समर्थक बताता है। उसके घोषणापत्र में चुनाव, नागरिक अधिकार और आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं की बात की जाती है। किन्तु इस दावे की विश्वसनीयता पर प्रश्न तब खड़े होते हैं जब उससे जुड़े संगठन MEK (मुजाहिदीन-ए-खल्क) के अतीत को देखा जाता है। MEK का इतिहास कई हिंसक गतिविधियों से जुड़ा रहा है। लोकतंत्र केवल लक्ष्य का नाम नहीं है; वह साधनों की भी परीक्षा लेता है। यदि लोकतंत्र की स्थापना हिंसक तरीकों के माध्यम से करने की कोशिश हो, तो उसके प्रति निष्ठा स्वाभाविक रूप से संदेह के घेरे में आ जाती है।

दूसरा विकल्प रज़ा पहलवी का है। वे ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के पुत्र हैं और आज भी राजशाही परंपरा के प्रतीक माने जाते हैं। पहलवी स्वयं को आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक ढांचे का समर्थक बताते हैं, परन्तु उनके विचार का मूल आधार राजशाही की पुनर्स्थापना है। इसका अर्थ है कि सत्ता का अंतिम प्रतीक एक वंशानुगत संस्था के रूप में कायम रहेगा। भले ही इसे संवैधानिक राजतंत्र के रूप में प्रस्तुत किया जाए, परन्तु यह व्यवस्था पूर्ण लोकतंत्र से अलग ही मानी जाएगी क्योंकि इसमें जनता की संप्रभुता के साथ एक स्थायी राजकीय प्रतीक भी जुड़ा रहता है।

तीसरा पक्ष IRGC के प्रभाव में चल रही वर्तमान व्यवस्था है, जो 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद स्थापित हुई थी। इस व्यवस्था में चुनाव होते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय लेने का अधिकार धार्मिक नेतृत्व के पास रहता है। इस ढांचे को कभी-कभी अप्रत्यक्ष लोकतंत्र कहा जाता है, परन्तु व्यवहार में यह एक धार्मिक संरक्षकतंत्र है जिसमें जनता की राजनीतिक स्वतंत्रता सीमित हो जाती है।इस प्रकार ईरान की राजनीति एक त्रिकोणीय संघर्ष में फंसी हुई है – एक ओर हिंसक अतीत से घिरा लोकतांत्रिक दावा, दूसरी ओर राजशाही की पुनर्स्थापना की आकांक्षा, और तीसरी ओर धार्मिक सत्ता का केंद्रीकरण। इन तीनों के बीच का संघर्ष ही वह वास्तविक कारण है जिसके कारण ईरान की जनता आज इतने कठिन दौर से गुजर रही है।

अमेरिका की भूमिका और उसकी सीमाएँ :

ईरान के प्रश्न पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका की भूमिका सबसे अधिक चर्चित रही है। अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर लंबे समय से कठोर रुख अपनाया है। कुछ लोग इसे लोकतंत्र बहाली की दिशा में दबाव के रूप में देखते हैं। यह स्वीकार करना होगा कि यदि किसी देश में शासन व्यवस्था अत्यधिक दमनकारी हो जाए, तो अंतरराष्ट्रीय चिंता स्वाभाविक है।

फिर भी यहाँ एक महत्वपूर्ण कमी दिखाई देती है। लोकतंत्र की रक्षा केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय वैधता से भी होती है। संयुक्त राष्ट्र में व्यापक चर्चा से बचना और एकतरफा कदम उठाना अमेरिकी नेतृत्व के उस दंभी और उद्दंड स्वभाव को दर्शाता है जिसने कई बार उसके स्वाभाविक सहयोगियों को भी असहज कर दिया है।

यूरोप के पारंपरिक सहयोगियों ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के साथ ट्रंप का दोयम दर्जे का व्यवहार भी इसी प्रवृत्ति का परिणाम है। इससे अमेरिका की महाशक्ति की छवि मजबूत होने के बजाय कमजोर होती दिखाई देती है। ईरान के विरुद्ध आक्रामक नीति के कारण उसके स्वाभाविक समर्थकों की संख्या भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है।

भारत की तटस्थता: एक उभरता संतुलन

इस पूरे संकट में भारत का रुख विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारत ने न तो किसी आक्रामक बयानबाजी में भाग लिया है और न ही स्वयं को किसी एक पक्ष के साथ खुलकर जोड़ने की जल्दबाजी दिखाई है। पहली दृष्टि में यह मौन प्रतीत हो सकता है, परन्तु कूटनीति में कभी-कभी संयम ही सबसे प्रभावी रणनीति होता है।भारत के लिए ईरान केवल एक राजनीतिक प्रश्न नहीं है। ऊर्जा सुरक्षा, मध्य-एशिया तक संपर्क, और क्षेत्रीय संतुलन जैसे कई आयाम इससे जुड़े हुए हैं। यदि ईरान में लोकतांत्रिक परिवर्तन होता है तो यह भारत के आर्थिक और रणनीतिक हितों को भी मजबूत कर सकता है।

यही कारण है कि वर्तमान तटस्थता को केवल निष्क्रियता नहीं कहा जा सकता। यह एक ऐसी रणनीति है जिसमें भारत किसी नए विवाद का केंद्र बने बिना स्वयं को संभावित संतुलनकारी शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है। जब अमेरिकी प्रशासन अपने ही आक्रामक निर्णयों और कूटनीतिक विवादों में उलझा हुआ दिखाई देता है, तब भारत का संयमित रुख एक परिपक्व शक्ति की पहचान देता है।

भारतीय राजनीति में प्रतिक्रिया :

अंतरराष्ट्रीय प्रश्नों पर भारत की आंतरिक राजनीति भी प्रतिक्रिया देती है। कुछ राजनीतिक वक्तव्यों में पुराने ईरानी शासन के प्रति सहानुभूति दिखाई देती है। ऐसे वक्तव्यों को कई लोग घरेलू वोट-बैंक की राजनीति से जोड़कर देखते हैं। किसी स्पष्ट रूप से अलोकतांत्रिक व्यवस्था के समर्थन में खड़ा होना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल नहीं माना जा सकता। यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या ऐसी राजनीतिक जिद वास्तव में सिद्धांतों से प्रेरित है, या फिर वह सीमित राजनीतिक गणित का परिणाम है।

निष्कर्ष :

ईरान का संकट केवल एक शासन परिवर्तन का प्रश्न नहीं है। यह उस व्यापक संघर्ष का हिस्सा है जिसमें समाज स्वतंत्रता, धर्म, आधुनिकता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन खोजने की कोशिश करता है।यदि ईरान में एक अहिंसक और वास्तविक लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित होती है, तो यह केवल वहां की जनता के लिए ही नहीं बल्कि पूरे मध्य-पूर्व के लिए एक ऐतिहासिक परिवर्तन हो सकता है।

और संभवतः यही वह क्षण है जब दुनिया को यह समझना होगा कि शक्ति से अधिक महत्वपूर्ण है वैधता, और हस्तक्षेप से अधिक प्रभावी है संतुलित कूटनीति। भारत की वर्तमान नीति इसी संतुलन की एक शांत लेकिन महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति बनकर सामने आती है।

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