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सुप्रीम कोर्ट का दोहराया हुआ स्पष्ट संदेश: धर्मांतरण पर एससी-एसटी दर्जा समाप्त, राज्यों को नियमों के पालन की याद दिलाई

नई दिल्ली, 26 मार्च 2026: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अपने एक आदेश में यह स्पष्ट किया है कि धर्मांतरण करने वाले व्यक्ति का अनुसूचित जाति (एससी) या अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा समाप्त हो जाता है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यह कोई नया कानून या बदलाव नहीं है, बल्कि संविधान में पहले से मौजूद प्रावधानों की पुनरुक्ति है।

दरअसल, संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि एससी का दर्जा केवल उन व्यक्तियों को मान्य है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से संबंधित हैं। इसी प्रकार, इस व्यवस्था की व्याख्या वर्षों से न्यायालयों द्वारा भी की जाती रही है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा आदेश में इसी संवैधानिक स्थिति को दोहराया है।

राज्यों की भूमिका पर सवाल

अदालत ने यह भी माना कि कुछ राज्य सरकारों द्वारा ऐसे मामलों में ढिलाई बरती गई, जहां धर्मांतरण के बाद भी एससी/एसटी प्रमाण पत्र जारी कर दिए गए। इसे न्यायालय ने व्यवस्था के दुरुपयोग के रूप में देखा और राज्यों को इस पर संयम बरतने तथा नियमों का कड़ाई से पालन करने का संकेत दिया।

दुरुपयोग रोकने पर जोर

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि आरक्षण और उससे जुड़े लाभों का उद्देश्य सामाजिक न्याय है, न कि गलत तरीके से लाभ उठाना। अदालत ने अपने पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए यह भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति पुनः अपने मूल धर्म में लौटता है, तो उसे अपने सामाजिक स्वीकृति और मूल पहचान को प्रमाणित करना होगा।

कोई नया बदलाव नहीं

इस पूरे निर्णय का सार यही है कि यह कोई नई व्यवस्था लागू करने का मामला नहीं है, बल्कि पहले से स्थापित संवैधानिक प्रावधानों को दोहराने और उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर देने का प्रयास है। सुप्रीम कोर्ट ने मूलतः राज्यों को यह याद दिलाया है कि वे प्रमाण पत्र जारी करते समय संवैधानिक मर्यादाओं का पालन सुनिश्चित करें।

इस फैसले को एक बड़े बदलाव के रूप में नहीं, बल्कि व्यवस्था को संतुलित और पारदर्शी बनाए रखने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

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