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अफसरों की अपनी ही सड़क ने ‘रोका’ रास्ता: NH-343 की बदहाली देख उल्टे पांव लौटे जिम्मेदार

रामानुजगंज । कहते हैं “कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर होता है”, लेकिन रामानुजगंज-राजपुर एनएच-343 के मामले में यह अंतर ‘सड़क और गड्ढों’ का है। करोड़ों की लागत से बन रही टू-लेन सड़क की गुणवत्ता का सर्टिफिकेट खुद विभाग के बड़े अधिकारियों ने दे दिया—वह भी वहां से भागकर!

खुद की बनाई राह पर नहीं चल सके साहब

विभागीय निरीक्षण के लिए जब अधीक्षण और कार्यपालन अभियंता लाव-लश्कर के साथ निकले, तो उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उनकी ही निगरानी में बन रही सड़क उनके स्वागत में ‘गड्ढे’ बिछाए बैठी होगी। निरीक्षण के नाम पर खानापूर्ति तो हुई, लेकिन जब वापसी की बारी आई तो अधिकारियों की हिम्मत जवाब दे गई। जिस रास्ते पर आम जनता रोज़ अपनी जान जोखिम में डालकर चलती है, उस पर साहब की गाड़ियों के टायर जवाब दे गए। नतीजा यह हुआ कि उन्हें वाड्रफनगर का चक्कर काटकर वैकल्पिक रास्ते से सुरक्षित निकलना पड़ा।

ठेकेदार की मनमानी, जनता की परेशानी

स्थानीय लोगों में इस घटना को लेकर भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि:

  • नियम ताक पर: नियमों के मुताबिक निर्माण के दौरान भी सड़क चलने लायक होनी चाहिए, लेकिन यहाँ सिर्फ धूल और बदहाली का राज है।
  • लापरवाही की इंतहा: करोड़ों के प्रोजेक्ट में ठेकेदार और विभाग की साठगांठ ने सड़क को चलने लायक भी नहीं छोड़ा है।
  • मौन अधिकारी: जब इस अव्यवस्था पर अधिकारियों से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने ‘मौन व्रत’ धारण करना ही बेहतर समझा।

बड़ा सवाल: जनता कब तक सहेगी?

यह घटना चीख-चीख कर बता रही है कि एनएच-343 का निर्माण मानकों के आधार पर नहीं, बल्कि केवल कागजों पर चमक रहा है। सवाल यह उठता है कि जिस रास्ते पर चलने से खुद इंजीनियर कतरा रहे हैं, उस पर सफर करने वाली जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? क्या विभाग इस गंभीर लापरवाही पर ठेकेदार पर कार्रवाई करेगा, या फिर मामला फाइलों में ही दफन हो जाएगा?

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