साम्यवाद : परंपरा-विरोध की राजनीति और दासता का षड्यंत्र
— भारतीय सामाजिक दर्शन के आलोक में एक विवेचना —
— ज्ञानेन्द्र आर्य —
साम्यवाद को समझने के लिए उसके सिद्धांतों की पुस्तकें पढ़ना पर्याप्त नहीं है। उसे समझने के लिए यह देखना होगा कि वह समाज के साथ व्यवहार में कैसे प्रकट होता है। जब हम साम्यवादी आंदोलनों और विचारकों के आचरण का गहन अवलोकन करते हैं, तो एक तथ्य बड़ी स्पष्टता से उभरता है — उनके विरोध का केंद्र वे सामाजिक परंपराएँ और मूल्य होते हैं जिनके आधार पर समाज सदियों से जीवन जीता आया है। धर्म, परिवार, विवाह-संस्था, स्त्री-पुरुष की भूमिकाएँ, सांस्कृतिक अनुष्ठान — इन सबका खुलकर और मुखरता से विरोध करना साम्यवाद की पहचान बन गई है।
किंतु यहाँ एक गहरा विरोधाभास भी है। जिन परंपराओं और मान्यताओं का साम्यवादी खुलकर विरोध करते हैं, वे अपने निजी जीवन में प्रायः उन्हीं का अनुसरण करते पाए जाते हैं। परिवार बनाते हैं, संतान को अपनी विचारधारा से दीक्षित करते हैं, सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखते हैं — फिर भी सार्वजनिक मंच पर उनका विरोध जारी रहता है। यह विरोधाभास आकस्मिक नहीं है। यह एक सुनियोजित रणनीति है।

शर्म, भ्रम और भय — दासता का त्रिकोण
मैंने अपनी पुस्तक आशा खोती मानवता में विस्तार से विवेचना की है कि किसी व्यक्ति को उसके संसाधनों और अधिकारों से वंचित करने के लिए तीन ही अस्त्र पर्याप्त हैं — शर्म, भ्रम और भय। जो व्यक्ति इन तीनों से ग्रस्त हो जाता है, वह स्वयं ही अपने संसाधन, अपने अधिकार और अंततः अपनी स्वतंत्र वैचारिकी को समर्पित कर देता है। उसे बाहर से जंजीरें पहनाने की आवश्यकता नहीं रहती।
साम्यवाद की परंपरा-विरोधी रणनीति इसी सूत्र पर काम करती है। जब किसी समाज की सांस्कृतिक जड़ों को बार-बार प्रश्नों के घेरे में लाया जाता है, जब उसकी मान्यताओं को पिछड़ेपन का प्रतीक घोषित किया जाता है, तो उस समाज का व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी ही परंपराओं से शर्मिंदा होने लगता है। जब परिभाषाएँ बदली जाती हैं, इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है, तो भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। और जब यह भ्रम गहरा हो जाता है, तो उसमें से भय अपने-आप जन्म लेता है — अपनी परंपराओं को थामे रहने का भय, समाज में अप्रासंगिक हो जाने का भय।
यह तीनों मिलकर जिस व्यक्ति या समाज को जकड़ लेते हैं, वह बिना किसी बाहरी बल के एक अदृश्य दासता में जीने लगता है।
साम्यवाद का अंतिम लक्ष्य : एक नियंत्रणकर्ता, समूची मानवजाति
साम्यवाद की परंपरा-विरोधिता को यदि केवल एक दार्शनिक असहमति मानकर चला जाए, तो उसके वास्तविक स्वभाव को समझना कठिन हो जाएगा। सच यह है कि इस विरोध के पीछे एक सुस्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य है — समूची मानव जाति को एक केंद्रीय नियंत्रणकर्ता के अधीन लाना।
मार्क्स ने मनुष्य की जो कल्पना की, उसमें उसकी मानसिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना के लिए कोई स्थान नहीं था। उसने मनुष्य को एक आर्थिक इकाई के रूप में परिभाषित किया — उत्पादन और उपभोग के बीच झूलता एक यंत्र। जब मनुष्य की आत्मा, उसकी परंपराएँ, उसके मूल्य और उसकी सांस्कृतिक अस्मिता — ये सब अप्रासंगिक घोषित कर दी जाती हैं, तो शेष बचता है केवल एक ऐसा जीव जिसे किसी बाहरी शक्ति के निर्देश पर चलना ही होगा। साम्यवाद उस बाहरी शक्ति को ‘राज्य’ कहता है।
वर्तमान साम्यवादी विमर्श में राज्य को समाज के संरक्षक और अभिभावक की भूमिका में प्रतिष्ठित किया जाता है। राज्य ही तय करेगा कि समाज के लिए क्या उचित है, क्या अनुचित है; क्या मान्य है, क्या वर्जित है। इस प्रकार राज्य समाज का नियामक नहीं, बल्कि उसका स्वामी बन जाता है।
भारतीय परंपरा में संरक्षक की अवधारणा : ब्राह्मण और राज्य का भेद
भारतीय सामाजिक दर्शन में भी एक संरक्षक की अवधारणा रही है। ब्राह्मण को समाज का मार्गदर्शक और वैचारिक संरक्षक माना गया। किंतु यहाँ साम्यवादी राज्य और भारतीय ब्राह्मण की भूमिका के बीच एक मौलिक और निर्णायक अंतर है —
ब्राह्मण एक वैचारिक इकाई है, संगठनात्मक नहीं। वह अपने सुझाव, अपनी व्याख्या और अपना मार्गदर्शन समाज के सामने रखता है। समाज उसे स्वीकार करे या न करे — यह समाज का विवेक तय करता है। ब्राह्मण के पास अपनी बात मनवाने के लिए कोई दंड-शक्ति नहीं होती। उसकी भूमिका बाध्यकारी नहीं, सुझावात्मक होती है।
इसके विपरीत, साम्यवादी राज्य एक संगठनात्मक इकाई है। राज्य का सबसे आवश्यक तत्त्व ही संप्रभुता है — अर्थात वह शक्ति जिसके आधार पर उसके आदेश को मानना शेष समाज के लिए बाध्यकारी हो जाता है। जब यही राज्य समाज का ‘संरक्षक’ बन जाता है, तो संरक्षण एक अनुग्रह नहीं, एक नियंत्रण बन जाता है।
समाज की वैचारिकी का अपमान ही दासता की पहली पहचान
भारतीय सामाजिक दर्शन में समाज ही संप्रभुता का वाहक रहा है। यही कारण है कि यहाँ परंपराएँ थोपी नहीं गईं — वे समाज की सामूहिक जीवन-यात्रा से उद्भूत हुईं और समाज ने ही उन्हें समय के साथ परिष्कृत किया। यह एक जीवंत और स्वशासी व्यवस्था थी।
साम्यवाद इसी स्वशासिता को नष्ट करता है। जब राज्य को समाज का अभिभावक घोषित कर दिया जाता है, तो समाज के प्रत्येक व्यक्ति की अपनी वैचारिकी — उसका विवेक, उसकी परंपरागत समझ, उसका सांस्कृतिक ज्ञान — सब निरर्थक हो जाता है। उसे केवल राज्य के निर्देशों का पालन करना है।
और यही दासता की पहली और सबसे स्पष्ट पहचान है — जब किसी व्यक्ति की अपनी वैचारिकी का कोई मूल्य न माना जाए। दास वह नहीं जिसके हाथ बंधे हों; दास वह है जिसे सोचने का अधिकार न हो, या जो अपनी सोच पर स्वयं ही भरोसा करना भूल गया हो।
उपसंहार : विरोध एक रणनीति है, असहमति नहीं
साम्यवाद का परंपरा-विरोध इसलिए नहीं है कि वे परंपराएँ वास्तव में हानिकारक हैं। यह विरोध एक सुनिश्चित रणनीति है — समाज को उसकी जड़ों से काटने की, उसे शर्म, भ्रम और भय में डुबोने की, और उस रिक्तता में एक नए स्वामी को प्रतिष्ठित करने की। वह स्वामी है — साम्यवादी राज्य।
भारतीय समाज को इस षड्यंत्र को समझना होगा। उसे अपनी परंपराओं का अंध-समर्थक नहीं बनना है — परंपराओं की समालोचना होनी चाहिए, सुधार होने चाहिए। किंतु यह समालोचना समाज के अंदर से, समाज की अपनी वैचारिकी से होनी चाहिए — किसी बाहरी नियंत्रणकर्ता के एजेंडे से नहीं। जिस दिन समाज ने अपनी वैचारिकी पर अपना भरोसा खो दिया, उस दिन उसकी स्वतंत्रता का क्षरण आरंभ हो जाता है।
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ज्ञानेन्द्र आर्य | gyantatva.in
