साम्यवादी कौन है — पहचान कैसे करें?बजरंग मुनि जी के सप्त सिद्धांतों के आलोक में— ज्ञानेन्द्र आर्य
साम्यवाद की जड़ें हम समझ चुके हैं। मार्क्स से ग्राम्शी तक, लुकाच से मार्क्युज़ तक — यह एक सुनियोजित षड्यंत्र है जो एक शताब्दी में धीरे-धीरे रचा गया। किंतु सबसे कठिन और सबसे आवश्यक प्रश्न अब भी शेष है —
इन्हें पहचाना कैसे जाए?

यह प्रश्न इसलिए कठिन है क्योंकि आधुनिक सांस्कृतिक मार्क्सवादी खुले मैदान में नहीं लड़ते। वे आपके आसपास हैं — आपकी भाषा बोलते हैं, आपकी हाँ में हाँ मिलाते हैं, आपकी टिप्पणी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। प्रतिकूलता चाहे जितनी भी हो — वे चुप रहते हैं। यह चुप्पी कमज़ोरी नहीं — रणनीति है।
ग्राम्शी ने इसी को “संस्थाओं में लम्बा मार्च” कहा था — भीतर से, धीरे-धीरे, बिना शोर के।
तो फिर पहचान कैसे हो?
पहचान का एकमात्र विश्वसनीय आधार — सिद्धांत नहीं, आचरण
साम्यवादी को उसके कथन से नहीं, उसके कार्य और आचरण से पहचाना जा सकता है। और इसके लिए सबसे विश्वसनीय कसौटी है — बजरंग मुनि जी के सप्त सिद्धांत।
मेरी पुस्तक समाज सर्वोच्च के अंतिम अध्याय में मैंने इन सात सिद्धांतों पर विस्तार से लिखा है। ये सिद्धांत व्यक्ति की असीम स्वतंत्रता और सहजीवन की अनिवार्यता के लिए आवश्यक आधार हैं। जो इन सातों के विपरीत आचरण करे — वह साम्यवादी विचारधारा का वाहक है।
आइए एक-एक सिद्धांत के आलोक में देखें —
१. अहिंसा और सत्य — इनके विपरीत जो करे
सहजीवन का आधार अहिंसा और सत्य है। सत्य विश्वास का आधार है, अहिंसा संबंधों का।
जो व्यक्ति या संगठन —
- अपने लक्ष्य के लिए झूठ को हथियार बनाए
- विरोधी को हिंसा की भाषा से चुप कराए
- “बड़े उद्देश्य” के नाम पर छोटे झूठों को उचित ठहराए
— वह इस सिद्धांत का उल्लंघनकर्ता है।
अलिंस्की ने Rules for Radicals में खुलकर लिखा — “साधन को साध्य उचित ठहराता है।” यही सत्य और अहिंसा का सबसे बड़ा शत्रु है।
२. सत्ता का अकेन्द्रीकरण — इनके विपरीत जो करे
लोक स्वराज का आधार यह है कि निर्णय नीचे से ऊपर जाएँ — शक्ति मूल इकाइयों में निहित हो।
जो व्यक्ति या संगठन —
- सत्ता को एक केंद्र में संकेन्द्रित करने की वकालत करे
- राज्य को समाज का अभिभावक घोषित करे
- स्थानीय निर्णय-शक्ति को कमज़ोर करे
- “हम ही जानते हैं तुम्हारे लिए क्या सही है” — यह भाव रखे
— वह साम्यवादी षड्यंत्र का अंग है।
मार्क्युज़ का पूरा दर्शन इसी पर टिका था — व्यक्ति की स्वतंत्र वैचारिकी को नकारो, राज्य को संरक्षक बनाओ।
३. वर्ग समन्वय — इनके विपरीत जो करे
विचारक, व्यवस्थापक, उत्पादक और श्रमिक — ये सब पूरक हैं, विरोधी नहीं।
जो व्यक्ति या संगठन —
- समाज में वर्ग-शत्रुता को हवा दे
- “ब्राह्मण बनाम दलित”, “पूँजीपति बनाम मज़दूर” — ऐसे ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे
- समन्वय की बजाय संघर्ष को स्थायी बनाए रखे
- हर समस्या का समाधान टकराव में खोजे
— वह मार्क्सवादी वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत का व्यावहारिक संवाहक है।
यही अलिंस्की का नियम १३ है — “लक्ष्य चुनो, ध्रुवीकृत करो।”
४. श्रम के साथ न्याय — इनके विपरीत जो करे
हर श्रम को सम्मान और न्याय — यही आर्थिक न्याय का वास्तविक आधार है।
यहाँ एक गहरा विरोधाभास देखिए —
साम्यवाद श्रमिक के नाम पर खड़ा होता है, किंतु व्यवहार में —
- सस्ती कृत्रिम ऊर्जा से श्रम को अप्रासंगिक बनाता है
- शिक्षित बेरोजगारी का शोर मचाता है, किंतु उसका समाधान राज्य-नियंत्रण में खोजता है
- श्रमिक को संगठन का बंधक बनाता है — उसकी व्यक्तिगत शक्ति संगठन के पास चली जाती है
जो श्रम की बात करे किंतु श्रमिक को राज्य या संगठन का मोहरा बनाए — वह श्रम का शत्रु है, मित्र नहीं।
५. सामाजिक व्यवस्थाओं की पुनर्स्थापना — इनके विपरीत जो करे
परिवार, ग्रामसभा और स्थानीय तंत्र — इन्हें पुनर्जीवित करना आवश्यक है। राज्य इनका स्थान नहीं ले सकता।
जो व्यक्ति या संगठन —
- परिवार को “पितृसत्ता” कहकर तोड़े
- ग्राम और स्थानीय व्यवस्था को “पिछड़ापन” बताए
- हर सामाजिक समस्या का समाधान राज्य के हस्तक्षेप में खोजे
- सामाजिक इकाइयों को कमज़ोर करके व्यक्ति को राज्य के सामने अकेला खड़ा करे
— वह ग्राम्शी की उसी रणनीति पर चल रहा है जो सौ वर्ष पहले रची गई थी।
लुकाच ने 1919 में यही किया था — बच्चों को परिवार के विरुद्ध शिक्षित करो।
६. राज्य-नियंत्रित नहीं, राज्य-संरक्षित अर्थव्यवस्था — इनके विपरीत जो करे
अर्थव्यवस्था समाज के हाथ में हो — राज्य केवल सुरक्षा दे, नियंत्रण नहीं।
जो व्यक्ति या संगठन —
- राज्य के अधिकाधिक हस्तक्षेप को न्यायसंगत ठहराए
- “सरकार दे, सरकार बाँटे” — इस निर्भरता को बढ़ावा दे
- निजी उद्यम और स्वतंत्र अर्थव्यवस्था को “शोषण” घोषित करे
- समाज की आर्थिक स्वायत्तता को नष्ट करके उसे राज्य का मुँहताज बनाए
— वह साम्यवादी आर्थिक नियंत्रण की दिशा में काम कर रहा है।
७. योग्यता को प्रतिस्पर्धा की स्वतंत्रता — इनके विपरीत जो करे
योग्यता को पूर्ण अवसर मिले — कृत्रिम बाधाएँ समाप्त हों।
जो व्यक्ति या संगठन —
- योग्यता को “विशेषाधिकार” कहकर अस्वीकार करे
- मेधा और परिश्रम को नकारकर केवल “समूह-पहचान” को आधार बनाए
- कृत्रिम समानता के नाम पर स्वाभाविक प्रतिस्पर्धा को नष्ट करे
- किसी एक विचारधारा को “सही” और शेष सबको “दमनकारी“ घोषित करे
— वह मार्क्युज़ की “दमनकारी सहिष्णुता” का व्यावहारिक रूप है।
संगठन — साम्यवाद की सबसे बड़ी शक्ति और सबसे बड़ा छद्म
बजरंग मुनि जी ने संगठन की एक मौलिक परिभाषा दी है —
“संगठन कमज़ोर लोग बनाते हैं — मज़बूतों से अपनी सुरक्षा के लिए।”
“संस्था मज़बूत लोग बनाते हैं — कमज़ोरों की मदद के लिए।”
साम्यवादी संगठन इसी सिद्धांत का दुरुपयोग करता है। वह कमज़ोरों की सुरक्षा के नाम पर बनता है — किंतु धीरे-धीरे उन्हीं का शोषण करने लगता है। संगठन में जुड़े लोग अपनी व्यक्तिगत शक्ति और अधिकार संगठन को सौंप देते हैं। फिर वही शक्ति संगठन के अवसरवादी नेताओं के हाथ में केंद्रित हो जाती है।
विचारक एरिक हॉफर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक The True Believer: Thoughts on the Nature of Mass Movements में इसे स्पष्ट रेखांकित किया है — “शक्ति की भूख संगठन में धूर्तों का वर्चस्व स्थापित कर देती है।” और ये धूर्त — जो संगठन मज़बूतों से रक्षा के लिए बनाया था — मज़बूतों के साथ मिलकर कमज़ोरों का शोषण करने लगते हैं।
यही साम्यवाद का वास्तविक चेहरा है।
व्यावहारिक पहचान — सात संकेत
उपरोक्त सात सिद्धांतों के आधार पर पहचान के सात व्यावहारिक संकेत —
१. जो व्यक्ति समन्वय की जगह संघर्ष की भाषा बोले — हर विषय में “हम बनाम वे” का ढाँचा खड़ा करे।
२. जो परिवार, धर्म और परंपरा को निरंतर प्रश्नांकित करे किंतु उनका कोई व्यावहारिक विकल्प न दे।
३. जो राज्य के विस्तार को हमेशा न्यायसंगत ठहराए और सामाजिक स्वायत्तता को घटाने की वकालत करे।
४. जो योग्यता और परिश्रम को “विशेषाधिकार” कहे और समूह-पहचान को हर समस्या का उत्तर बताए।
५. जो झूठ को “बड़े उद्देश्य” के नाम पर उचित ठहराए — साधन की शुचिता को अप्रासंगिक माने।
६. जो विरोधी विचार को दबाने के लिए संस्थागत शक्ति का उपयोग करे — खुली बहस से बचे।
७. जो किसी संगठन के प्रति अंध-निष्ठा रखे और उस संगठन की आलोचना को व्यक्तिगत शत्रुता माने।
उपसंहार — पहचान ही प्रतिकार है
साम्यवादी को उसके लाल झंडे से नहीं पहचाना जाता। उसे पहचाना जाता है उसके आचरण से, उसकी भाषा से, उसके संगठन से और उन सात सिद्धांतों के प्रति उसके व्यवहार से जो एक स्वस्थ समाज की नींव हैं।
जब कोई सत्य की जगह छल रखे, समन्वय की जगह संघर्ष रखे, समाज की जगह राज्य रखे और व्यक्ति की स्वतंत्रता की जगह संगठन की अधीनता रखे — तब समझिए कि यह विचारधारा वही है जो एक शताब्दी से मानवता की जड़ें काट रही है।
षड्यंत्र की पहचान ही उसका सबसे बड़ा प्रतिकार है।
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ज्ञानेन्द्र आर्य
समाज सर्वोच्च | आशा खोती मानवता | gyantatva.in
