समुद्रवत संघ—अटल स्वभाव और सर्वसमावेशी दर्शन
प्रस्तावना: शांति का सागर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना प्रायः उस अनंत सागर से की जाती है, जो समस्त चर-अचर को स्वयं में समाहित कर उन्हें परम शांति प्रदान करता है। जिस प्रकार संसार की समस्त नदियाँ अंततः सागर में मिलकर अपना अस्तित्व उसी में विलीन कर देती हैं, उसी प्रकार संघ भी समाज के हर अंग को स्वयं में आत्मसात करने की क्षमता रखता है।

सागर का एक विशिष्ट गुण है—उसका खारापन। यह खारापन संकेत है कि वह व्यक्तिगत उपभोग की वस्तु नहीं है। सागर स्वयं कुछ ग्रहण नहीं करता, बल्कि भाप बनकर, बादल बनकर संपूर्ण जीव जगत की प्यास बुझाता है। संघ का चरित्र भी इसी के समतुल्य है। संघ में शामिल होने वाला व्यक्ति कुछ प्राप्त करने की अभिलाषा लेकर नहीं आता, बल्कि अपना सर्वस्व अर्पण करने के भाव से आता है। जो यहाँ ‘प्राप्ति’ की इच्छा से आता है, उसे अंततः निराशा ही हाथ लगती है, क्योंकि संघ किसी व्यक्ति विशेष या समूह विशेष को लाभ पहुँचाने वाली संस्था नहीं, बल्कि समाज के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाला एक ‘संगठन रूपी सागर’ है।
लंबे समय तक विरोधियों द्वारा यह प्रचारित किया गया कि संघ पर किसी एक विशेष वर्ग या जाति का वर्चस्व है। किंतु समय ने इस मिथक को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। जब कुछ स्वार्थी तत्वों ने संगठित होकर संघ से विशेष रियायतों की अपेक्षा की, तब संघ ने अपने सिद्धांतों से समझौता करने के बजाय अपने ‘समुद्रवत स्वभाव’ का परिचय दिया। संघ ने स्पष्ट कर दिया कि वह ‘सर्वजाति, सर्वधर्म और सर्वमानव’ के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है। किसी एक जाति के तुष्टीकरण के लिए यहाँ कोई स्थान नहीं है। आज यह सिद्ध हो चुका है कि संघ अपनी परीक्षा में सफल रहा है और स्वार्थ की राजनीति करने वाले परास्त हुए हैं।
वर्तमान परिदृश्य में, कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले लोग अपने व्यक्तिगत हितों के लिए राष्ट्रविरोधी तत्वों या सत्ता के लोभियों के साथ मेल-जोल बढ़ा सकते हैं। इससे चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं या सत्ता के गलियारों में हलचल मच सकती है, किंतु संघ का मूल स्वभाव अपरिवर्तित रहना चाहिए। संघ का अस्तित्व सरकार बनाने या गिराने के लिए नहीं, बल्कि समाज निर्माण और राष्ट्र के चरित्र निर्माण के लिए है।
सागर कभी धमकियों या लहरों के उफान से विचलित नहीं होता। हमें मुट्ठी भर स्वार्थी लोगों के प्रयासों के बजाय संपूर्ण समाज की सामूहिक योग्यता और शक्ति पर विश्वास करना चाहिए। संघ को एक गंभीर और मर्यादित सागर के समान ही अडिग रहना होगा, क्योंकि राष्ट्र की अंतिम आशा इसी सर्वसमावेशी दर्शन पर टिकी है। मार्ग कितना भी कठिन क्यों न हो, सत्य और न्याय के पथ से विचलन असंभव है।
